छह साल से हर्बल गुलाल बना रहा समूह की महिलाएं
राधे-कृष्ण समूह की महिला पूजा ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उनका समूह पिछले करीब छह सालों से लगातार हर्बल गुलाल बनाने का काम कर रहा है. शुरुआत से ही उन्होंने तय किया कि गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक होगा, ताकि इसे इस्तेमाल करने से त्वचा को कोई नुकसान न पहुंचे.
फूलों और पत्तियों से तैयार होते हैं रंग
पूजा ने बताया कि हर्बल गुलाल बनाने में गेंदा फूल, चुकंदर, पालक पत्ती, सेमी पत्ती जैसी प्राकृतिक चीजों का उपयोग किया जाता है. इन्हीं से अलग-अलग रंग तैयार किए जाते हैं. फिलहाल उनके पास चेरी फूल, गेंदा फूल और पालक पत्ती उपलब्ध हैं, जिनसे कई रंगों का गुलाल तैयार हो चुका है.
होली से पहले शुरू होती है तैयारी
समूह कि महिला ने बताया कि होली से करीब एक सप्ताह पहले ही गुलाल बनाने का काम शुरू कर दिया जाता है. इसके बाद लगभग एक महीने तक लगातार निर्माण चलता है, ताकि मांग के अनुसार पर्याप्त गुलाल तैयार किया जा सके. इस पूरे काम में एक ही समूह की महिलाएं मिलकर मेहनत करती हैं.
ऐसे होती है गुलाल बनाने की प्रक्रिया
गुलाल तैयार करने की प्रक्रिया के बारे में पूजा ने बताया कि कुछ चीजों को उबाला जाता है, जबकि कुछ को सुखाकर ग्राइंड किया जाता है. इसके बाद आरारोट पाउडर मिलाया जाता है. फिर मिश्रण को अच्छी तरह सुखाकर दोबारा पीसा जाता है और छन्नी से छानकर तय माप में पैक किया जाता है.
बच्चों और त्वचा के लिए पूरी तरह सुरक्षित
पूजा का कहना है कि यह गुलाल त्वचा के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। अगर गलती से बच्चों के मुंह में भी चला जाए, तो कोई नुकसान नहीं होता, क्योंकि इसमें किसी तरह का केमिकल नहीं मिलाया जाता. उन्होंने बताया कि पिछले साल जिन लोगों ने यह गुलाल खरीदा था, उनसे आज तक कोई शिकायत नहीं मिली है और वही ग्राहक इस साल भी दोबारा उनसे ही गुलाल खरीद रहे हैं.
खेती भी खुद करती हैं महिलाएं
हर्बल गुलाल में इस्तेमाल होने वाले फूल और पत्तियों की खेती भी समूह की महिलाएं खुद करती हैं. इससे न सिर्फ लागत कम होती है, बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता पर भी पूरा नियंत्रण रहता है.
लागत के अनुपात में होती है आमदनी
आमदनी को लेकर पूजा ने बताया कि जितनी पूंजी लगाई जाती है, आमदनी भी उसी अनुपात में होती है. वहीं समूह की दूसरी महिला अंजना मिस्त्री ने बताया कि अगर करीब 50 हजार रुपये की लागत लगाई जाए, तो लगभग डेढ़ लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है.
दाने नहीं निकलते, यही है खासियत
अंजना मिस्त्री ने बताया कि इस हर्बल गुलाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चेहरे पर लगाने से दाने नहीं निकलते. बच्चों के लिए भी यह पूरी तरह सुरक्षित है, इसी वजह से लोग इसे भरोसे के साथ खरीद रहे हैं.
ट्रेनिंग से मिली नई दिशा जानिए
पूजा ने बताया कि एक सर और मैडम ने उन्हें इस काम की ट्रेनिंग दी थी. शुरुआत में करीब एक सप्ताह तक पूरी प्रक्रिया समझाई गई, जिसके बाद महिलाओं ने खुद गुलाल बनाना शुरू कर दिया.
घर की चारदीवारी से पहचान तक का सफर
जब अंजना से पूछा गया कि पहले वे क्या करती थीं और अब क्या बदलाव आया है, तो उन्होंने बताया कि पहले वे सिर्फ घर तक सीमित थीं. अब साल में एक बार ही सही, लेकिन जब सभी महिलाएं मिलकर गुलाल बनाती हैं, तो उन्हें अच्छा लगता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है.
कलेक्टर ऑफिस तक पहुंची मेहनत की पहचान
पूजा ने बताया कि ट्रेनिंग मिलने के बाद उन्हें एक नई पहचान मिली. वे कलेक्टर ऑफिस तक गईं, वहां अपने गुलाल को दिखाया और दुकान लगाने की सिफारिश की. जांच के बाद उनके उत्पाद को सही पाया गया. इसके बाद से लोग उन्हें “हर्बल गुलाल” के नाम से पहचानने लगे हैं और आज उनकी मेहनत से पूरे इलाके में उनका नाम जाना जा रहा है.
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