ईसाई समाज में वर्षों से चली आ रही एक परंपरा के तहत क्रिसमस के अवसर पर घास (राटा), बांस और रस्सियों से पारंपरिक चरनी का निर्माण किया जाता है. यह चरनी प्रभु यीशु के उस सादे जीवन की याद दिलाती है, जिसमें उन्होंने एक गरीब परिवार में, टूटे-फूटे गौशाला में जन्म लिया था. मसीही समाज के लोग मानते हैं कि चरनी बनाकर वे प्रभु यीशु के जीवन मूल्यों सादगी, प्रेम और त्याग को नई पीढ़ी तक पहुंचाते हैं. यही वजह है कि आधुनिक समय में भी यह पारंपरिक चरनी बनाने की परंपरा आज तक जीवित है. देखिए ये रिपोर्ट…
चरनी में हुआ था ईशा मसीह का जन्म
स्थानीय इलबिलस तिर्की ने लोकल 18 को बताया कि मान्यताओं के अनुसार ईशा मसीह का जन्म गौशाला में, यानी चरनी में हुआ था. उस समय उन्हें रहने के लिए कोई उचित स्थान नहीं मिला था, इसलिए उनका जन्म एक साधारण और टूटी-फूटी गौशाला में हुआ. इसी ऐतिहासिक और धार्मिक घटना की याद में आज भी चरनी बनाने की परंपरा चली आ रही है.
घास, बांस और रस्सी से बनती है परंपरागत चरनी
इलबिलस तिर्की ने बताया कि परंपरागत चरनी बनाने के लिए राटा (सूखी घास), बांस और रस्सी का उपयोग किया जाता है. रस्सी से ढांचा बांधा जाता है और बांस के सहारे उसे गौशाला जैसा रूप दिया जाता है. हालांकि, समय के साथ लोग अपनी सुविधा और कल्पना के अनुसार सजावट करते हैं, लेकिन घास की साधारण चरनी बनाना ही परंपरा का मूल स्वरूप माना जाता है.
24 दिसंबर की रात से शुरू होता है क्रिसमस उत्सव
चरनी का विशेष महत्व 24 दिसंबर की रात को होता है. मान्यता है कि ईशा मसीह का जन्म 25 दिसंबर की मध्यरात्रि के आसपास हुआ था. इसी कारण क्रिसमस का पर्व 24 दिसंबर की रात से शुरू होकर 25 दिसंबर तक मनाया जाता है. यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है.
सादगी और त्याग का संदेश देती है चरनी की पुरानी परंपरा
सिलबिलुस तिर्की ने लोकल 18 को बताया कि चरनी का उद्देश्य प्रभु ईशा मसीह के जीवन के उस पहलू को दर्शाना है, जिसमें उन्होंने अभावों के बीच जन्म लेकर भी पूरी दुनिया को प्रेम और मानवता का संदेश दिया. वे पूरे संसार के भगवान माने जाते हैं और उनके अनुयायी भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं.
गरीब परिवार में जन्म लेकर दिया महान संदेश
वहीं प्रताप खलखो ने बताया कि चरनी बनाकर यह याद दिलाया जाता है कि ईशा मसीह इतने बड़े मसीहा होने के बावजूद एक गरीब परिवार में जन्मे थे. गौशाला में जन्म लेना उनकी सादगी और त्याग का प्रतीक है. इसी भाव को जीवंत रखने के लिए आज भी मसीही समाज चरनी बनाकर प्रभु यीशु के जन्मदिन को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाता है.
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