परंपरा जो आज भी ज़िंदा है
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में अगरिहा समाज सदियों पुरानी तकनीक के जरिए सीमेंट की खाली बोरियों से बेहद मजबूत रस्सी (डोरा) बनाता है. आधुनिक दौर में जहां बाजार में तरह-तरह की मशीन बनी रस्सियां उपलब्ध हैं. वहीं, यह समाज अपने पूर्वजों से मिली इस कला को आज भी उसी समर्पण से निभा रहा है.
कचरे से उपयोगी चीज़ बनाने की अनूठी कला
ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में इस रस्सी का प्रयोग मवेशी बांधने, जंगल से लकड़ी ढोने और कई घरेलू जरूरतों में किया जाता है. सीमेंट की बोरी, जिसे आमतौर पर कूड़े में फेंक दिया जाता है, उसे घर लाकर जरूरत की मजबूत वस्तु बनाना वास्तव में अनोखा हुनर है.
बुजुर्ग कारीगर बताए विरासत का रहस्य
लोकल 18 से बातचीत में अगरिहा समाज के एक बुजुर्ग कारीगर प्याज लाल बताते हैं की
“हमारे दादा-परदादा के समय से लोग सीमेंट बोरी से डोरा बनाते आए हैं. ज़्यादा खर्च नहीं आता और थोड़ी मेहनत से बेहद मजबूत रस्सी तैयार हो जाती है. 70 वर्ष की उम्र में भी ये बुजुर्ग आज इस कला को ज़िंदा रखे हुए हैं. उम्र ढल चुकी है, मगर हाथों की ताकत और हुनर आज भी वैसा ही है.
ऐसे तैयार होती है देसी मजबूत रस्सी जानिए…
इस रस्सी को बनाने की प्रक्रिया बेहद रोचक और मेहनत वाली है.
पहले सीमेंट बोरी को काटकर उसके पतले–पतले प्लास्टिक धागे निकाले जाते हैं.
फिर परंपरागत तरीके से इन्हें मोड़कर, कसकर घुमाकर मजबूत डोरे का रूप दिया जाता है.
यह प्रक्रिया देखने में भले आसान लगे, लेकिन इसमें धैर्य, कौशल और अनुभव की आवश्यकता होती है.
बाज़ार से सस्ती, इस्तेमाल में ज्यादा मजबूत ….
गांवों के लोग बताते हैं कि यह देसी डोरा बाज़ार में मिलने वाली रस्सियों से कहीं ज्यादा टिकाऊ होती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत लगभग ज़ीरो लागत और वर्षों तक चलने वाली मजबूती.
नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश जानिए कैसे…
अगरिहा समाज के बुजुर्ग कारीगर प्याज लाल मानते हैं कि यह सिर्फ एक कला नहीं बल्कि विरासत है. इसलिए वे बच्चों और युवाओं को भी इस हुनर से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि यह परंपरा आने वाले समय में भी जीवित रहे.
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