सुपौल जिले के निर्मली स्थित संस्कृत परिसर में आयोजित अनोखे होली मिलन समारोह ने सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल पेश की। यहां होली रंग और गुलाल से नहीं, बल्कि फूलों की बरसात से खेली गई। सैकड़ों हिंदू और मुस्लिम बुजुर्ग महिला-पुरुषों ने जाति, धर्म और ऊंच-नीच का भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे पर फूल बरसाए, गले मिले और होली गीतों पर झूमते नजर आए। पूरा वातावरण आपसी प्रेम और समरसता की जीवंत तस्वीर बन गया। होली मिलन के बाद सामूहिक महाभोज का आयोजन किया गया, जहां सभी समुदायों के लोगों ने एक साथ बैठकर भोजन किया। यह दृश्य सामाजिक एकता और आपसी विश्वास का प्रतीक बन गया। धर्म और जाति की दीवारें कोई मायने नहीं रखतीं
बुजुर्ग संघ के अध्यक्ष सीता राम मंडल ने बताया कि वर्ष 2008 की कोसी त्रासदी ने उन्हें सिखाया कि आपदा के समय धर्म और जाति की दीवारें कोई मायने नहीं रखतीं। बाढ़ ने सबको संगठित होकर जीना सिखाया। उसी दौर से प्रेरित होकर बुजुर्गों ने सैकड़ों समूह बनाए, जो आज सामाजिक एकता और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रहे हैं। मुस्लिम बुजुर्ग कार्यक्रम में शामिल हुए
कार्यक्रम में शामिल मो. मोलिम अंसारी ने कहा कि 2008 की बाढ़ ने सभी को समान रूप से प्रभावित किया और भाईचारे से रहने की सीख दी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 से हर साल बिना भेदभाव के होली मिलन मनाया जा रहा है। रमजान के पाक महीने के बावजूद बड़ी संख्या में मुस्लिम बुजुर्ग कार्यक्रम में शामिल हुए। जिला पार्षद किरण कुशवाहा ने इसे वसुधैव कुटुंबकम की मिसाल बताया। वहीं स्थानीय सुशील कुमार ने कहा कि बाढ़ के बाद बने बुजुर्ग समूह आज सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ समाज को नई दिशा दे रहे हैं। सुपौल का यह आयोजन साबित करता है कि जब दिल मिलते हैं, तो हर रंग अपने आप खिल उठता है।
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