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पलामू के कृषि वैज्ञानिक डॉ. उदय सिंह के अनुसार, चने की कटाई के बाद खाली खेतों में सूरजमुखी की खेती मुनाफे का शानदार जरिया है. कम पानी और मात्र 90 दिनों में तैयार होने वाली यह फसल न केवल जमीन का सदुपयोग करती है, बल्कि तेल उत्पादन के जरिए किसानों को मालामाल भी कर सकती है.
चने की कटाई के बाद खाली खेतों में सूरजमुखी की खेती किसानों के लिए एक मुनाफेमंद विकल्प है. इसकी खेती कम समय और कम पानी में तैयार हो जाती है, जिससे जमीन खाली नहीं रहती. सूरजमुखी के बीजों से तेल उत्पादन कर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं और बेहतर बाजार मूल्य पाकर अच्छा लाभ कमा सकते हैं.

<br />कृषि विज्ञान केंद्र पलामू के कृषि वैज्ञानिक डॉ उदय सिंह ने लोकल18 को बताया कि पलामू जिले में सूरजमुखी की खेती किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बनकर उभर रही है. कम समय में तैयार होने वाली यह तिलहनी फसल कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है. पलामू का जलवायु और मिट्टी सूरजमुखी की खेती के लिए अनुकूल है. खासकर रबी और जायद सीजन में इसकी खेती कर किसान अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं.

सिंह ने बताया कि सूरजमुखी की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या हल्की बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेहतर होती है. मिट्टी का पीएच मान लगभग 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए. सूरजमुखी को धूप की पर्याप्त जरूरत होती है, इसलिए खुले खेत में इसकी खेती करना अधिक लाभदायक होता है. पलामू जैसे क्षेत्र में जहां गर्मी और धूप पर्याप्त मिलती है, वहां यह फसल अच्छे परिणाम देती है.
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सूर्यमूखी का पौधा

पलामू क्षेत्र में सूरजमुखी की बुवाई रबी में नवंबर से दिसंबर और जायद में फरवरी से मार्च के बीच करना बेहतर माना जाता है. बुवाई कतारों में करनी चाहिए. कतार से कतार की दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखना चाहिए. एक हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 5 से 6 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है.

आगे कहा कि अच्छी पैदावार के लिए खेत में जैविक खाद का उपयोग करना जरूरी होता है. बुवाई से पहले खेत में 8 से 10 टन गोबर की सड़ी हुई खाद डालनी चाहिए. इसके अलावा रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश संतुलित मात्रा में देना चाहिए. इससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और दाने भी बेहतर बनते हैं.

आगे कहा कि सूरजमुखी की फसल को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन समय पर सिंचाई जरूरी होती है. बुवाई के बाद अंकुरण के समय, फूल आने के समय और दाना बनने के समय सिंचाई करना लाभकारी होता है. साथ ही खेत में खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी है, ताकि पौधों को पर्याप्त पोषण मिल सके.

सूरजमुखी की फसल में तना छेदक, पत्ती खाने वाले कीट और झुलसा रोग का खतरा रहता है. इससे बचाव के लिए समय-समय पर खेत की निगरानी करनी चाहिए. आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से कीटनाशक का छिड़काव करना चाहिए. इससे फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि सूरजमुखी की फसल लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है. एक हेक्टेयर खेत से औसतन 18 से 25 क्विंटल तक उत्पादन मिल सकता है. बाजार में सूरजमुखी के तेल की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छा दाम मिलता है. कम लागत और कम समय में अधिक लाभ मिलने के कारण पलामू के किसानों के लिए सूरजमुखी की खेती एक लाभदायक विकल्प बन सकती है.
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