Sitamarhi Public Opinion : सीतामढ़ी के देमा पंचायत में 50 साल से बागमती नदी पर ग्रामीण पुल का इंतजार कर रहे हैं. यहां नाव हादसे तो आम बात हो गई है. जहां सरकार की घोषणाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं. ऐसे में यहां ग्रामीणों की सरकार से काफी नाराजगी है.
स्थानीय ग्रामीण कुंती देवी और बुधिया देवी बताती हैं कि कई बार प्रसूति महिलाओं की डिलीवरी नाव पर ही करनी पड़ी है. अस्पताल पहुंचने से पहले कई लोग दम तोड़ चुके हैं. नाव हादसे यहां आम बात है. खासकर बारिश और बाढ़ के दौरान नाव का सहारा लेकर नदी पार करना बेहद जोखिम भरा हो जाता है. दूसरी ओर सतीश कुमार का कहना है कि जहां पुल बनना है वह पुराना सड़क मार्ग था, जिस पर PWD की अपनी जमीन मौजूद है. जमीन अधिग्रहण का सवाल ही नहीं है. फिर भी अधिकारी और सरकार उदासीन बने हुए हैं. कुछ दिन पहले सांसद के प्रतिनिधि ने सिर्फ बोर्ड लगाकर औपचारिकता पूरी की थी.
फिलहाल यहां जो नाव चल रही है. वह बिहार सरकार के अंचल कार्यालय द्वारा आवंटित है, लेकिन इसे स्थानीय लोग ही संचालित करते हैं. ग्रामीण केशव कुमार बताते हैं कि वर्षों से सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि केवल आश्वासन देते आए हैं. 50 साल में न जाने कितने लोग इलाज के अभाव में और नाव हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन पुल निर्माण की दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है. ग्रामीणों में सरकार के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है.
मुशहरी गांव और आसपास के दलित टोले के लोगों का कहना है कि नदी में साल भर पानी रहने से गांव दो हिस्सों में बंटा रहता है. एक ओर मुख्य मुशहरी गांव और दूसरी ओर दलित कॉलोनी है. जहां करीब 200 घरों में हजार से ज्यादा आबादी रहती है. यहां बीच-बीच में चचरी पुल बनाया गया, लेकिन बाढ़ के बाद वह बह जाता है. बरसात के दिनों में हालात और बिगड़ जाते हैं. वर्ष 2020-21 के आम बजट सत्र में सरकार ने सड़क और पुल निर्माण की घोषणा की थी, जिससे लोगों में आस जगी थी, लेकिन वर्षों बाद भी घोषणा केवल कागजों में ही दबकर रह गई.
ग्रामीणों का मानना है कि पुल बन जाने से न सिर्फ देमा और मुशहरी गांव में आवागमन सुगम होगा. बल्कि रिगा, डुमरा, बेलसंड और शिवहर के कई प्रखंड सीधे जुड़ जाएंगे. अभी इन गांवों तक पहुंचने के लिए 2 किलोमीटर की दूरी 7 किलोमीटर में बदल जाती है. पुल के अभाव में शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं यहां तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं. लोगों की स्पष्ट मांग है कि अब वादे नहीं, ठोस कार्रवाई की जरूरत है. ताकि 50 साल का यह ‘उम्मीद का पुल’ आखिरकार हकीकत बन सके.
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बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में लगभग 4 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ संप्रति News.in में सीनियर कंटेंट राइटर हैं. …और पढ़ें
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