Historical Heritage: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित तेरही गांव इतिहास और प्राचीन स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. यहां महुआर नदी के किनारे स्थित मोहजमाता का प्राचीन मंदिर आज भी अपनी अनोखी बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण लोगों को आकर्षित करता है. माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण करीब दसवीं शताब्दी में कच्छपघात वंश के शासकों द्वारा कराया गया था. समय के साथ मंदिर का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन इसकी कई संरचनाएं आज भी प्राचीन गौरव की झलक दिखाती हैं.
मध्य भारत में बिखरी ऐतिहासिक धरोहरें
मध्य भारत में अलग-अलग कालखंडों के कई मंदिर, किले, महल और मठ देखने को मिलते हैं। यहां लगभग हर गांव में प्राचीन मंदिर, शिलालेख या किसी राजा द्वारा निर्मित ऐतिहासिक संरचना मिल जाती है। हालांकि समय, प्राकृतिक आपदाओं और आक्रमणों के कारण इनमें से कई धरोहरें खंडहर में तब्दील हो गईं, जबकि कुछ को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित किया गया है। तेरही गांव का मोहजमाता मंदिर भी ऐसी ही महत्वपूर्ण धरोहरों में शामिल है।
903 ईस्वी के शिलालेख से जुड़ा इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर संभवतः वही चंदिया मंदिर है, जिसका उल्लेख 903 ईस्वी के एक शिलालेख में मिलता है. मंदिर का प्रवेश द्वार इसकी सबसे खास पहचान है. यह भव्य तोरण द्वार स्थानीय लोगों में तुरारी द्वार के नाम से प्रसिद्ध है और इसे भी लगभग दसवीं शताब्दी का माना जाता है. इस द्वार पर बेहद सुंदर और बारीक नक्काशी की गई है, जो उस समय की उच्च स्तरीय शिल्पकला को दर्शाती है.
तोरण द्वार पर अद्भुत देव प्रतिमाएं
तोरण द्वार के मध्य भाग में सात घोड़ों द्वारा खींचे जा रहे रथ पर विराजमान भगवान सूर्य की प्रतिमा उकेरी गई है. उनके दोनों ओर भगवान कार्तिकेय और देवी इंद्राणी की आकृतियां दिखाई देती हैं. पीछे की ओर भगवान विष्णु की नक्काशी के अवशेष हैं, जिनके दोनों तरफ चामुंडा देवी और वैष्णवी देवी की मूर्तियां बनी हुई हैं. इसके अलावा मंदिर के स्तंभों पर भगवान वराह, हयग्रीव, बलराम, गणेश, अग्नि, विष्णु, हरिहर, कुबेर और देवी सरस्वती सहित कई देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं उकेरी गई हैं.
मंदिर की बनावट और प्राचीन कलाकारी
मंदिर के तोरण और दीवारों पर नर्तकियों, संगीतकारों, वृक्षों के पैटर्न और विभिन्न धार्मिक प्रतीकों की नक्काशी भी देखने को मिलती है. पूर्व दिशा की ओर मुख किए इस मंदिर में मुख मंडप और गर्भगृह मौजूद है, हालांकि समय के साथ इसका शिखर नष्ट हो चुका है. ललाट बिम्ब पर चार भुजाओं वाली देवी की क्षतिग्रस्त प्रतिमा दिखाई देती है, जो किसी प्रेत पर सवार प्रतीत होती है. वहीं, चौखट पर सप्तमातृकाओं की नक्काशी भी की गई है.
भूत-प्रेत की आकृतियों से जुड़ी मान्यता
इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता इसके बाहरी हिस्से पर बनी भूत, प्रेत और कंकाल जैसी आकृतियां हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह मंदिर मूल रूप से काली माता को समर्पित था और इसका संबंध मृत्यु के बाद होने वाली ‘तेरहवीं’ की परंपरा से भी जोड़ा जाता है. यही कारण है कि इस मंदिर के आसपास इस तरह की प्रतीकात्मक आकृतियां बनाई गई हैं.
एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक
मंदिर परिसर में कई प्राचीन मूर्तियों और स्तंभों के अवशेष भी पाए गए हैं. इनमें से कुछ महत्वपूर्ण कलाकृतियों को संरक्षण के लिए ग्वालियर के पुरातत्व संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। वर्तमान में यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज है.
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