ग्रामीणों के अनुसार माँ ने दूसरी शादी कर ली है और पंचायत रिकॉर्ड में इन बच्चों के साथ माँ का नाम भी कट चुका है.आज इन मासूमों के पास न माता-पिता का सहारा है, न सिर पर पक्की छत और न ही भविष्य की कोई ठोस सुरक्षा. 17 साल की सबसे बड़ी बहन आठवीं कक्षा में पढ़ाई के साथ साथ अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण के लिए पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो गई. हालांकि, वह आगे पढ़ना चाहती थी. बिना संरक्षण, बिना सहारे और बिना किसी स्थायी मदद के ये चारों बच्चे रोज़ ज़िंदगी की कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं. जब सोशल मीडिया पर यह खबर सामने आई, तो न्यूज़ 18 की टीम ने ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर हकीकत जानने का फैसला किया.
कठिन पैदल सफर तय कर जब टीम मटवाड़ गांव पहुँची, तो हालात दिल दहला देने वाले थे. घर के बाहर तीन मासूम बच्चे अपने भाई का इंतज़ार कर रहे थे. बड़ी बहन कभी-कभार मजदूरी कर थोड़े-बहुत पैसे कमा लेती है और बच्चों के साथ घर में बैठी थी. 14 साल का भाई रोज़ी-रोटी की तलाश में बाहर गया हुआ था. जिस कच्चे मकान में ये बच्चे रह रहे हैं, उसकी हालत इतनी जर्जर है कि कभी भी ज़मीन धंस सकती है. आने वाली बर्फबारी में इस घर के गिरने का खतरा मंडरा रहा है.घर के भीतर का मंजर और भी दर्दनाक था. एक तरफ मवेशी बंधे थे और दूसरी तरफ बच्चे अपने बिस्तरों पर बैठे आंसू बहा रहे थे. सामने छोटी-सी रसोई थी, जहाँ भाई के लौटने के बाद ही चूल्हा जलने की उम्मीद थी. हालात ऐसे कि किसी का भी कलेजा पसीज जाए.सरकार के पास गरीब और असहायों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना, मुख्यमंत्री आवास योजना सहित दर्जनों योजनाएँ मौजूद हैं, लेकिन इन बच्चों के लिए अब तक कोई भी योजना नहीं पहुँच पाई.
न्यूज़ 18 की टीम ने ग्राउंड ज़ीरो पर जाकर हकीकत जानने का फैसला किया.
हालांकि जब इन बच्चों से उनके हालात के बारे में पूछना चाहा तो उन्होंने पहले तो सब कुछ कहने से इनकार कर दिया, लेकिन जो थोड़ा बहुत कहा, वह उनकी हकीकत बयां करने के लिए काफी था. जब बड़ी बहन से पूछा गया, तो उसने बताया कि वे कई सालों से इसी कच्चे मकान में रह रहे हैं. चार साल पहले पिता की मौत हो गई थी, माँ बीमार थी और बाद में उन्हें छोड़कर चली गई. आज वे अपना गुजर-बसर खुद ही कर रहे हैं.

चाचा का घर पास में है और वे वार्ड मेंबर भी हैं, लेकिन बच्चों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो पाया.
चाचा वार्ड मैंबर, लेकिन नहीं सुधरी हालात
हालाँकि चाचा का घर पास में है और वे वार्ड मेंबर भी हैं, लेकिन बच्चों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो पाया. चाचा का कहना है कि बच्चे अभी 18 साल के नहीं हुए हैं, इसलिए सरकारी मदद नहीं मिल पा रही है. वहीं छोटे बच्चे स्कूल जाना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों और सहारे के अभाव में पढ़ाई भी मुश्किल बन चुकी है. छोटी बच्ची से बात करने की कोशिश की गई, तो वह खामोश रही—शायद हालात ने उससे बोलने की ताकत भी छीन ली है. अब उम्मीद की जा रही है कि सरकार और प्रशासन की नजर इन अनाथ बच्चों पर पड़ेगी और उन्हें आवास, शिक्षा व संरक्षण जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँगी, ताकि इन मासूमों का बचपन और भविष्य दोनों सुरक्षित हो सकें. उधर, सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल होने के बाद स्थानीय प्रशासन ने इन बच्चों के संरक्षण की बात तो शुरू कर दी है और प्रशासन का कहना है कि बच्चों को सुखाश्रय योजना में शामिल किया जाएगा.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.