छात्रों का कहना है कि इस पहल से उन्हें किताबों तक सीमित रहने के बजाय व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हो रहा है. जैविक उत्पाद निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को वे प्रत्यक्ष रूप से समझ पा रहे हैं. उनका मानना है कि यदि इस तरह के उत्पादों को व्यावसायिक रूप दिया जाए तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो सकते हैं…
छात्रों द्वारा तैयार किया जाने वाला यह गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक स्रोतों पर आधारित है. इसके लिए सबसे पहले आसपास के मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों को एकत्र किया जाता है ताकि उपयोग के बाद फेंके जाने वाले फूलों का पुनः सदुपयोग हो सके. आवश्यकता के अनुसार गुलाब और गेंदा जैसे फूलों का चयन किया जाता है. इसके अलावा धनिया और चुकंदर जैसे प्राकृतिक तत्वों से भी अलग-अलग रंग तैयार किए जाते हैं. गुलाल बनाने की प्रक्रिया में छात्र सबसे पहले फूलों की पंखुड़ियों को सावधानीपूर्वक अलग करते हैं और उन्हें पानी से धुलते हैं. इसके बाद इन पंखुड़ियों को अरारोट के साथ मिक्सिंग कर मशीन में बारीक पीसा जाता है जिससे मुलायम और त्वचा के लिए सुरक्षित पाउडर तैयार होता है. तैयार मिश्रण को कमरे के तापमान पर सुखाया जाता है ताकि उसका प्राकृतिक रंग और गुणवत्ता बरकरार रहे. अंत में प्राकृतिक सुगंध मिलाकर इसे इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया जाता है. पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रासायनिक या हानिकारक पदार्थ का प्रयोग नहीं किया जाता.
गुलाल बनाने में मिली ये सीख और अनुभव
छात्रों का कहना है कि इस पहल से उन्हें किताबों तक सीमित रहने के बजाय व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हो रहा है. जैविक उत्पाद निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को वे प्रत्यक्ष रूप से समझ पा रहे हैं. उनका मानना है कि यदि इस तरह के उत्पादों को व्यावसायिक रूप दिया जाए तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो सकते हैं और किसानों को प्राकृतिक और फूलों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी छात्रों के इस प्रयास की सराहना करते हुए इसे सामाजिक जागरूकता की दिशा में सकारात्मक पहल बताया है. हर्बल गुलाल के माध्यम से छात्र यह संदेश दे रहे हैं कि त्योहारों की खुशियां प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर भी मनाई जा सकती हैं.
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