कृषि वैज्ञानिक उदय कुमार सिंह ने कहा कि लौकी, कद्दू, करेला, खीरा, तोरई जैसी लत्तेदार सब्जियों की खेती किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है. इन फसलों से कम समय में अच्छी आमदनी होती है, लेकिन कीट-रोगों का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी चुनौती बना रहता है.
रबी मौसम की लत्तेदार फसलें
कृषि विज्ञान केंद्र, पलामू के कृषि वैज्ञानिक उदय कुमार सिंह के अनुसार रबी सीजन में कई प्रकार की लत्तेदार फसलें उगाई जाती हैं. इस समय कई फसलें बढ़वार की अवस्था में होती हैं, जबकि कुछ में पहले से ही अच्छी बढ़वार हो चुकी होती है. इसी अवस्था में कीटों का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचता है
देसी तरीके से नियंत्रण
लाल कीट के नियंत्रण के लिए देसी और पारंपरिक उपाय भी प्रभावी हैं. कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, राख का उपयोग एक पुराना और कारगर तरीका है. किसान पौधों की पत्तियों पर राख का छिड़काव कर सकते हैं. पहले के समय में इस विधि का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता था और हल्के प्रकोप की स्थिति में इससे अच्छा नियंत्रण संभव है.
रासायनिक उपाय और सावधानियां
यदि राख के उपयोग से कीट का नियंत्रण न हो पाए और किसान बड़े पैमाने पर सब्जी की खेती कर रहे हों, तो रासायनिक दवाओं का सहारा लिया जा सकता है. इसके लिए मिथाइल डोमिटन दवा, जो बाजार में 25 ईसी के रूप में उपलब्ध है, का उपयोग किया जा सकता है. एक मिलीलीटर दवा को एक लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर स्प्रे करें. विशेष रूप से लौकी जैसे पौधों में यह ध्यान रखना जरूरी है कि दवा बड़े-बड़े पत्तों पर अच्छी तरह फैल जाए, ताकि लाल कीट का प्रभावी नियंत्रण हो सके.
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