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Surguja shahtoot recipe : सरगुजा के गांवों में गर्मी में शहतूत से सब्जी और चटनी बनती है, जिसे आदिवासी पारंपरिक तरीके से तैयार करते हैं. सिकंदर प्रजापति ने इसके स्वाद और स्वास्थ्य लाभ बताए हैं. छत्तीसगढ़ में इसेे खूब पसंद किया जाता है.
Food Story : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला के ग्रामीण इलाकों में जैसे ही गर्मी का मौसम दस्तक देता है, गांवों में शहतूत के पेड़ों से फल तोड़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. यहां आदिवासी समुदाय शहतूत के कच्चे फलों से पारंपरिक तरीके से सब्जी और चटनी तैयार करता है, जो स्वाद में लाजवाब होती है. वहीं पके शहतूत को नमक और मिर्च के साथ रगड़कर खाने का अलग ही मजा मिलता है. शहतूत की चटनी पारंपरिक शील पत्थर पर पीसकर बनाई जाती है, जो देखने में टमाटर की चटनी जैसी लगती है, लेकिन स्वाद में बिल्कुल अलग और खास होती है. इसकी सब्जी भी अनोखे तरीके से तैयार की जाती है, जो गर्मियों में गांवों की थाली को खास बनाती है. यही वजह है कि शहतूत, सरगुजा के गांवों में गर्मी के मौसम की एक अलग पहचान बन चुका है.
जून-जुलाई में होती है सहतूत की खेती
स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति ने लोकल 18 को बताया कि सहतूत की खेती आमतौर पर वही लोग करते हैं, जिन्हें इसकी सही जानकारी होती है. इसकी खेती ढगाल काटकर जून-जुलाई महीने में की जाती है. एक से डेढ़ साल के भीतर पौधों में फल आना शुरू हो जाता है. वर्तमान में पेड़ों में फर्स्ट क्लास ब्लैक कलर के फल लगे हुए हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक होते हैं और स्वाद में खट्टे-मीठे लगते हैं.
खाने में होता है कई तरह से उपयोग
सिकंदर प्रजापति ने बताया कि सहतूत का उपयोग सिर्फ फल के रूप में ही नहीं, बल्कि सब्जी और चटनी बनाने में भी किया जाता है. गांव-देहात में इससे बनने वाली चटनी खास सरगुजिया देहाती अंदाज में तैयार की जाती है. देखने में यह टमाटर की चटनी जैसी होती है, लेकिन इसका स्वाद अलग ही खट्टा-मीठा होता है.
सिल-बट्टा में बनी चटनी का अलग ही स्वाद
सिकंदर ने बताया कि सहतूत की चटनी अगर सिल-बट्टा या खलबट्टा में पीसकर बनाई जाए और उसमें अदरक-लहसुन मिलाया जाए, तो इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है. हरे फल को पेड़ से तोड़कर उसमें धनिया, लहसुन, प्याज, मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाकर पीस लिया जाता है. यह चटनी खाने में बेहद लाजवाब होती है और गांवों में खूब पसंद की जाती है.
सिकंदर प्रजापति ने बताया कि सहतूत का उपयोग ज्यादातर आदिवासी क्षेत्रों में किया जाता है, जबकि शहरी इलाकों में इसका चलन काफी कम है. स्वास्थ्य की दृष्टि से सहतूत बहुत लाभकारी है. सर्दी-खांसी में इसकी चटनी खाने से गला पूरी तरह साफ हो जाता है और राहत मिलती है.
सहतूत की सब्जी भी है खास
सिकंदर ने बताया कि सहतूत की सब्जी भी बेहद स्वादिष्ट होती है, जिसे बच्चे भी बड़े चाव से खाते हैं. सब्जी बनाने के लिए कच्चे फल को तोड़कर पानी से अच्छी तरह धोया जाता है, फिर हल्का सुखाकर तेल, हल्दी और अन्य मसालों के साथ छौंक लगाकर पकाया जाता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि सहतूत की सब्जी केवल कच्चे फल से ही बनाई जाती है, पके फल से सब्जी नहीं बनती.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें
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