झारखंड में सर्दियों में आदिवासी घरों में एक खास पारंपरिक पकवान बनाया जाता है. यह चावल के आटे और गुड़ से तैयार होता है. जिसे अक्सर नए अनाज आने पर या मेहमानों के लिए बनाया जाता है. ढकनेसर स्वादिष्ट होता है और शरीर को गर्म रखने में मदद करता है. इसे मिट्टी के बर्तन में बनाने की परंपरा है.
वैसे तो झारखंड में कई तरह के पकवान बनाएं जाते है. सर्दियों के मौसम में एक पकवान सभी आदिवासी घरों में बनाएं जाते है. जिसे आदिवासी परिवार खास मौकों पर बनाते हैं. यह पकवान चावल के आटे और गुड़ से तैयार किया जाता है और शरीर को गर्म रखता है. इसे ढकनेसर कहा जाता है.

रेसिपी साझा करते हुए हजारीबाग की आदिवासी महिला रवीना कच्छप कहती हैं कि यह व्यंजन उनके घर में पीढ़ियों से बनता आ रहा है. नया अनाज आने पर, पूजा-पर्व के दिन या मेहमान आने पर ढकनेसर जरूर बनता है. यह बनाना भी आसान है और खाने में बहुत स्वादिष्ट लगता है. सर्दियों के मौसम नए चावल से इसे बनाया करते है.

उन्होंने आगे बताया कि इसे बनाने के लिए सबसे पहले चावल को फूला जाता है. फिर इसे बारिक पीसकर घोल बना लिया जाता है. इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि बैटर ना अधिक पतला हो और ना ही अधिक गाढ़ा.
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इसको बनाने के लिए खास मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है. बदलते दौर में लोग मिट्टी के बर्तन के अलावा कढ़ाई या तवे पर भी इसे बनाने लगे हैं, लेकिन मिट्टी में बने इस पकवान की खुशबू सबसे अधिक होती है.

तैयार किए गए बैटर को मिट्टी के बर्तन में पुवा के आकार में डाला जाता है. जिसके बाद उसे मिट्टी के दूसरे बर्तन से ढक दिया जाता है. करीब 2 मिनट के बाद यह अच्छे तरीके से पक जाता है.

इसे पकाने के दौरान मिट्टी के तवे को अच्छे तरीके से गर्म किया जाता है और उसमें घी भी लगाया जाता है. पकने के दौरान ढकनेसर का रंग धीरे-धीरे हल्का सुनहरा हो जाता है और इसकी खुशबू पूरे कमरे में फैल जाती है.

<br />ढकनेसर पक जाने के बाद इसके लिए दूध तैयार किया जाता है. दूध में चीनी और इलायची मिलाकर हल्का गाढ़ा किया जाता है. फिर इस ढकनेसर को उसमें फूलने के लिए डाल दिया जाता है. करीब एक से डेढ़ घंटे बाद यह तैयार हो जाता है. इसका स्वाद बच्चों से लेकर बूढ़े तक खूब चाव से लेते हैं.
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