Ranchi Famous Personality: रांची से सटे खूंटी में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा के बारे में कौन नहीं जानता. उनके नाम से चौक-चौराहे, स्टेडियम बहुत कुछ है जो उनके प्रति जनता और व्यवस्था के सम्मान को दर्शाता है. हालांकि उनके जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी बातें भी हैं जो ज्यादातर लोग नहीं जानते. आज उनकी ही चर्चा करते हैं.
झारखंड की राजधानी रांची में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम के साथ कई सारे चौक भी इनके नाम पर हैंलेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जयपाल सिंह मुंडा आदिवासियों की आवाज बड़े ही बुलंद तरीके से उठते थे. वह एक लेखक थे, पत्रकार थे और साथ में स्पोर्ट्स पर्सन भी थे. नीदरलैंड में आयोजित 1928 समर ओलंपिक में उन्होंने भारत को हॉकी में स्वर्ण पदक दिलाया था, वह टीम के कप्तान थे.

मुंडा बचपन से ही बेहद मेधावी छात्र थे. रांची के जाने वाले साहित्यकार मनोज बताते हैं, बचपन से ही उनके भीतर गजब का उत्साह देखा जाता था. हर चीज को लेकर चाहे खेल हो, चाहे पढ़ाई हो, वह खुद को किसी से कम नहीं समझते थे. आदिवासी घर में जन्मे थे लेकिन कभी खुद को यह नहीं समझते थे कि मैं किसी से कम हूं. उनको लगता था मैं दुनिया जीतने के लिए आया हूं.

उस समय के इंडियन सिविल सर्विस में इनका चयन हुआ था. जब इस परीक्षा में केवल 2-3 इंडियंस का चयन होता था. उनमें से इनका भी नाम था. अब आप समझ सकते हैं कि किस प्रकार के मेधावी छात्र होंगे. लेकिन हॉकी के प्रति उनका गजब का रुझान था. इतना ज्यादा की उन्होंने सिविल सर्विस को भी छोड़ दिया और हॉकी में अपना पूरा ध्यान लगाया और भारत को गोल्ड मेडल जिता दिया.
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साहित्यकार मनोज बताते हैं, जयपाल सिंह मुंडा, जिन्हें प्रमोद पाहन के नाम से भी जाना जाता था, का जन्म 3 जनवरी 1903 को ब्रिटिश भारत की बंगाल प्रेसीडेंसी (वर्तमान झारखंड) के रांची के खूंटी उपखंड में स्थित तकरा पाहंतोली गांव में एक ईसाई मुंडा परिवार में हुआ था. बचपन में मुंडा का काम मवेशियों की देखभाल करना था. गांव में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्हें रेवरेंड कुशलमाई शीतल द्वारा सेंट पॉल चर्च स्कूल में दाखिला दिलाया गया. 1910 में, उन्होंने रांची के सेंट पॉल स्कूल में प्रवेश लिया.

उन्होंने 1928 के एम्स्टर्डम ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारतीय फील्ड हॉकी टीम की कप्तानी करते हुए स्वर्ण पदक भी जीता था. बाद में, वे आदिवासियों के अधिकारों और मध्य भारत में उनके लिए एक अलग मातृभूमि के निर्माण के लिए एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में उभरे. भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में, उन्होंने संपूर्ण आदिवासी समुदाय के अधिकारों की वकालत की.
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