Ranchi Dr. Shyama Prasad Mukherjee: रांची के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पिछले 53 वर्षों से मात्र ₹5 में गरीबों का इलाज कर रहे हैं. उनकी निस्वार्थ सेवा के कायल मुकेश अंबानी ने भी उन्हें आर्थिक सहयोग दिया. पद्मश्री से सम्मानित डॉ. मुखर्जी ने प्रसिद्धि से दूर रहने के लिए KBC का आमंत्रण तक ठुकरा दिया, ताकि वे अपना पूरा समय मरीजों की सेवा में लगा सकें.
पद्मश्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रांची की धरोहर हैं. पिछले 53 वर्षों से वे लालपुर में मात्र ₹5 में मरीजों का इलाज कर रहे हैं. उनकी निस्वार्थ सेवा से प्रभावित होकर मुकेश अंबानी ने उन्हें ₹5 लाख का चेक भेंट किया था. उन्हीं के सम्मान में रांची विश्वविद्यालय के एक अंग को अब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी के रूप में जाना जाता है.

पद्मश्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सादगी की मिसाल हैं. उन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) का आमंत्रण भी ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें प्रसिद्धि या लाइमलाइट से लगाव नहीं है. उनका मानना है कि वे शोहरत के लिए नहीं, बल्कि गरीबों की सेवा के लिए बने हैं. 53 वर्षों से मात्र ₹5 में इलाज कर रहे डॉ. मुखर्जी आज भी चुपचाप मानवता की सेवा में जुटे हैं. उनके लिए मरीजों की मुस्कान ही सबसे बड़ा पुरस्कार है.

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना है कि हर डॉक्टर प्रतिदिन कम से कम दो गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करे. उनका मानना है कि यदि चिकित्सा जगत में यह सोच विकसित हो जाए, तो समाज के वंचित तबके के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं होगा. उनके अनुसार, डॉक्टरों का यही छोटा सा योगदान उनके जीवन के उद्देश्य को सार्थक बना देगा और मानवता की सेवा में एक मिसाल पेश करेगा.
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डॉ. मुखर्जी कहते हैं कि उन्हें बड़े आयोजनों या नाम चमकाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी उन गरीब बच्चों की मुस्कान है, जिन्हें सांस लेने की तकलीफ से वे निजात दिलाते हैं. वे मानते हैं कि एक स्वस्थ होकर सांस लेते बच्चे को देख जो आत्मसंतुष्टि मिलती है, वह 800 रुपये की भारी-भरकम फीस भी नहीं दे सकती. उनका एकमात्र लक्ष्य निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करना है.

पद्मश्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सेवा भावना पर लोकप्रिय निर्माता सुशील अंकल ने एक सराहे जाने वाली डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है. अनगिनत पुरस्कारों से नवाजे जाने के बावजूद डॉ. मुखर्जी को इन सम्मानों की गिनती याद नहीं रहती. वे बड़ी विनम्रता से कहते हैं कि उनका काम अवार्ड बटोरना नहीं, बल्कि मात्र ₹5 में गरीबों का इलाज करना है. उनके लिए सम्मान से बढ़कर वह सेवा है जो वे दशकों से कर रहे हैं.
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