पंजाब और हरियाणा में कैदियों की रिहाई और समयपूर्व रिहाई (रीमिशन/प्रीमेच्योर रिलीज) को लेकर अलग-अलग नीतियां लागू होने पर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने पंजाब और हरियाणा सरकार को कहा है कि वे अपनी रिहाई से जुड़े नियमों और शर्तों की तुलना करते हुए एक चार्ट बनाएं और उसे 3 हफ्ते के अंदर हलफनामा लगाकर अदालत में जमा करें। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की उस निगरानी मुहिम के तहत दिया गया है, जिसके तहत देशभर में कैदियों की रिहाई और समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया पर नजर रखी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को अपने-अपने राज्यों में इस व्यवस्था की निगरानी और पर्यवेक्षण करने के निर्देश दिए हैं। नीतियों में फर्क, पात्रता पर भ्रम मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पंजाब और हरियाणा की नीतियों में स्पष्ट अंतर है। जब तक यह साफ नहीं किया जाएगा कि किस राज्य में कौन-सा मापदंड लागू है, तब तक अदालत प्रभावी निगरानी कैसे कर सकती है। अदालत ने माना कि अलग-अलग नीतियों के कारण कैदियों की पात्रता को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। चंडीगढ़ में पंजाब नीति, हरियाणा में अलग नियम अदालत ने टिप्पणी की कि चंडीगढ़ प्रशासन पंजाब की रिहाई नीति का पालन करता है, जबकि हरियाणा अपनी अलग वैधानिक व्यवस्था के तहत काम कर रहा है। इससे पात्रता और मूल्यांकन के मापदंडों में फर्क आ रहा है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि कैदियों के लिए रीमिशन का पैमाना आखिर कहां और कैसे तय किया गया है, क्योंकि बिना स्पष्ट मापदंड के निष्पक्ष निगरानी संभव नहीं है। सरकारों ने अपनी-अपनी नीति बताई सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने अदालत को बताया कि राज्य में 14 दिसंबर 2017 की समयपूर्व रिहाई नीति के तहत मामलों पर निर्णय लिया जा रहा है। वहीं हरियाणा सरकार ने कहा कि वह हरियाणा जेल नियम, 2022 के अनुसार रिहाई और समयपूर्व रिहाई के मामलों पर फैसला करती है, जो प्रिजन्स एक्ट के प्रविधानों के तहत बनाए गए हैं। इन अलग-अलग व्यवस्थाओं के कारण पात्रता शर्तों में अंतर सामने आया है। तीन हफ्ते में चार्ट और हलफनामा दाखिल करने के निर्देश खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पंजाब और हरियाणा दोनों राज्य मिलकर एक संयुक्त तुलनात्मक चार्ट तैयार करें। इसमें दोनों राज्यों की नीतियों और नियमों के तहत तय पात्रता शर्तों को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए। इसके साथ हलफनामा दाखिल करना भी अनिवार्य होगा, ताकि अदालत सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार निगरानी और पर्यवेक्षण कर सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि जेलों में भीड़ कम करने, अनावश्यक देरी रोकने और कैदियों के साथ समान व न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम कदम है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह कह चुका है कि रिहाई और समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया देशभर में एकरूप, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए।
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