शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता और पंजाब के पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया ने पांच साल पुराने आपराधिक मामले में खुद को आरोपी सूची से बाहर किए जाने की मांग करते हुए चंडीगढ़ जिला अदालत में डिस्चार्ज एप्लीकेशन दायर की है। इस अर्जी पर 5 मार्च को सुनवाई निर्धारित की गई है। मजीठिया समेत कई नेताओं के खिलाफ हिंसा, पुलिस से झड़प और सरकारी आदेशों की अवहेलना के आरोप में मामला लंबित है। अब मजीठिया ने अदालत से अनुरोध किया है कि उन्हें इस केस से मुक्त किया जाए, क्योंकि उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश का हवाला मजीठिया के वकील राजेश कुमार ने अर्जी में कहा है कि इस मामले में सह-आरोपी महेश इंदर ग्रेवाल और दलजीत सिंह चीमा को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया था। अर्जी में कहा गया है कि जब समान परिस्थितियों में सह-आरोपियों को राहत दी जा चुकी है, तो मजीठिया के मामले में भी वही सिद्धांत लागू होना चाहिए। एडवोकेट राजेश कुमार ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट की शिकायत पर सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती थी। उनका कहना है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 के तहत पहले निजी शिकायत दायर की जानी चाहिए थी, इसके बाद ही आगे की कार्रवाई संभव थी। अर्जी में यह भी कहा गया है कि पुलिस के पास मजीठिया के खिलाफ कोई ठोस सबूत या स्वतंत्र गवाह उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में उनके विरुद्ध केस बनता ही नहीं है। जानिए पूरा मामला क्या था वर्ष 2021 में अकाली दल के कई नेता पंजाब में महंगाई और 1984 दंगों के विरोध में चंडीगढ़ स्थित मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने जा रहे थे। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए यूटी पुलिस ने बैरिकेडिंग की थी। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड तोड़े गए, पुलिस कार्य में बाधा डाली गई और सरकारी आदेशों का उल्लंघन किया गया। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इसके बाद सेक्टर-3 थाना पुलिस ने मजीठिया समेत कई नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। अब अदालत में दाखिल डिस्चार्ज अर्जी पर होने वाली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।
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