Pankhi Shawl Uttarakhand: उत्तराखंड का ‘पंखी शाल’ पहाड़ों की सादगी और हुनर का बेजोड़ नमूना है. भेड़ के मोटे और प्राकृतिक ऊन और हाथ से बुनी गई यह शॉल कड़ाके की ठंड में भी शरीर को अंगीठी की तरह गर्म रखती है. मशीनी युग में भी अपनी मजबूती और गर्माहट के दम पर पंखी शॉल ने पहाड़ों की संस्कृति को जिंदा रखा है. सबसे अच्छी बात यह है कि इतनी मेहनत से तैयार होने वाली यह शुद्ध ऊनी शॉल आज भी आम लोगों के बजट में है और बाजार में इसकी कीमत मात्र 1000 से 2000 रुपये के बीच है. जानिए क्यों पहाड़ों में आज भी लोग इसे आधुनिक जैकेटों से ज्यादा अहमियत देते हैं.
रोजमर्रा के जीवन का अटूट हिस्सा
गांवों में आज भी लोग सुबह से शाम तक के कामों में पंखी शॉल ओढ़े नजर आते हैं. महिलाएं घर का काम करते समय, दूर से पानी भरने जाते समय या खेतों में मेहनत करते वक्त इसे ओढ़ती हैं. पुरुष भी सुबह-शाम की सर्द हवाओं से बचने के लिए इसे अपने कंधों पर रखते हैं. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह वजन में काफी हल्की होती है, जिससे काम करने में परेशानी नहीं होती, लेकिन इसकी गर्माहट बहुत गहरी होती है.
पंखी शॉल सिर्फ ठंड से बचाने का साधन नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों की मेहनत और हुनर की पहचान है. इसे स्थानीय कारीगर अपने हाथों से पुराने लकड़ी के करघों पर बुनते हैं. इतनी मेहनत और शुद्ध ऊन से तैयार होने के बावजूद इसकी कीमत काफी वाजिब रखी गई है. बाजार में एक अच्छी और असली पंखी शॉल 1000 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक के बीच आसानी से मिल जाती है. कम कीमत और सालों साल चलने की मजबूती की वजह से ही यह हर वर्ग की पसंद बनी हुई है.
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भोटिया संस्कृति में है पंखी शॉल का विशेष महत्व
सालों से इन शॉलों का व्यापार कर रहे ईश्वर सिंह चलाल बताते हैं कि पंखी शॉल हमारी पहाड़ी पहचान है. इसे लोग सिर्फ ज़रूरत के लिए नहीं, बल्कि अपनी परंपरा से जुड़े रहने के लिए खरीदते हैं. भोटिया संस्कृति में तो यह इतनी पवित्र मानी जाती है कि दुल्हन को विदाई के समय इसे पहनाया जाता है. वहां इसे बहुत शुभ और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. हाथ से बनी इस शॉल की मजबूती और जो कुदरती गर्माहट होती है, वह मशीनों से बने कपड़ों में कभी नहीं मिल सकती.
आज के दौर में बाजार तरह-तरह की फैशनेबल और मशीनी शॉलों से भरा पड़ा है, लेकिन असली पंखी शॉल की साख आज भी बरकरार है. यह शॉल पहाड़ों की सादगी और वहां के लोगों के कठिन जीवन का आईना है. यही वजह है कि आज की नई पीढ़ी भी इसे गर्व से ओढ़ती है और अपनी जड़ों से जुड़ा महसूस करती है.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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