Pithoragarh News: पहाड़ की आत्मनिर्भरता का असली आधार वहां की महिलाएं हैं. सर्दियों में जब पहाड़ बर्फ और ठंड की चादर ओढ़ लेते हैं, तब पशुओं के चारे का संकट न खड़ा हो, इसके लिए महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर महीनों पहले से तैयारी शुरू कर देती हैं. दरांती और रस्सी लेकर दुर्गम रास्तों पर मीलों का सफर तय करना और भारी गट्ठर उठाकर घर तक लाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है.
महिलाओं का दिन सूरज निकलने से पहले ही शुरू हो जाता है. सबसे पहले वे घर के जरूरी काम निपटाती हैं, जैसे चूल्हा जलाना, बच्चों और बुजुर्गों के लिए खाना बनाना, पानी भरना और पशुओं की देखभाल करना. इन सभी कामों को पूरा करने के बाद वे सिर पर टोकरी या पीठ पर रस्सी बांधकर जंगल की ओर निकल पड़ती हैं. कई बार घास की तलाश में उन्हें बहुत दूर तक जाना पड़ता है. रास्ते कहीं पथरीले होते हैं, तो कहीं सीधी खड़ी चढ़ाई और फिसलन भरी ढलान होती है. ऐसे दुर्गम रास्तों पर खुद का और भारी गट्ठर का संतुलन बनाकर चलना अपने आप में एक बड़ी परीक्षा होती है.
जंगली जानवरों का डर और मौसम की मार
घास काटने का काम दिखने में जितना सरल लगता है, हकीकत में उतना ही खतरनाक है. घने जंगलों में हमेशा जंगली जानवरों का डर बना रहता है. इसके साथ ही पहाड़ का मौसम कब करवट बदल ले, इसका कोई भरोसा नहीं होता. कभी झुलसा देने वाली तेज धूप होती है, तो कभी अचानक मूसलाधार बारिश या हाड़ कंपाने वाली ठंडी हवाएं चलने लगती हैं. इन सभी मुश्किलों को झेलते हुए महिलाएं अपना काम जारी रखती हैं. घास काटने के बाद उसे बड़े-बड़े गट्ठरों में बांधा जाता है और फिर उसे सिर या पीठ पर उठाकर वापस गांव तक लाया जाता है. कई बार ये गट्ठर इतने भारी होते हैं कि कदम उठाना भी मुश्किल होता है, लेकिन वे बिना रुके धीरे-धीरे अपने घर की मंजिल तक पहुंचती हैं.
नर्वदा देवी की जुबानी सुनिए पहाड़ का दर्द
नर्वदा देवी बताती हैं कि वे लोग सुबह होते ही काम में जुट जाते हैं. पहले घर की जिम्मेदारी पूरी करते हैं और फिर घास के लिए निकल पड़ते हैं. कई बार बहुत ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ाई करनी पड़ती है और वहां से भारी बोझ उठाकर नीचे आना पड़ता है. उन्होंने कहा कि थकान तो बहुत होती है, लेकिन पशुओं के चारे का इंतजाम करना सबसे जरूरी है, इसलिए यह संघर्ष रोज का हिस्सा बन चुका है.
पहाड़ों की इन महिलाओं की कड़ी मेहनत ही घर और पशुओं की असली ताकत होती है. उनके द्वारा जुटाए गए घास के इन भंडारों से ही पूरे साल पशुओं का पेट भरता है और घर की गाड़ी चलती रहती है. यह सिर्फ घास जुटाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि पहाड़ की महिलाओं की अटूट जिम्मेदारी और उनके कभी न हार मानने वाले हौसले की सच्ची कहानी है.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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