Climate Change in Hills: पहाड़ों का मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा! गांव के बुजुर्गों की यह चिंता आज एक कड़वी हकीकत बन चुकी है. जंगलों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ते प्रदूषण के कारण देवभूमि की ठंडी हवाएं अब पसीने में बदल रही हैं. 75 वर्षीय धन सिंह और जमुना देवी जैसे ग्रामीणों के अनुभवों के जरिए जानिए कैसे जलवायु परिवर्तन पहाड़ों की बर्फ और खेती को लील रहा है. क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को वही शुद्ध हवा और बर्फ लौटा पाएंगे? पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट.
नहीं पड़ीं थी पंखे जरूरत
पुराने समय में गर्मियां इतनी सुहानी होती थीं कि पंखे की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. मई-जून के महीने में भी लोग जैकेट और स्वेटर पहनते थे. बारिश अपने समय पर होती थी, जिससे खेती लहलहाती थी और प्राकृतिक जल स्रोत कभी नहीं सूखते थे. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. गर्मी पहले से ज्यादा महसूस होती है.
जंगल रखा था मौसम को संतुलित
बर्फबारी का ग्राफ साल-दर-साल नीचे जा रहा है. बरसात का भी अब कोई भरोसा नहीं रह गया है, कभी बादल फटने जैसी अतिवृष्टि से भूस्खलन होता है, तो कभी महीनों सूखा पड़ा रहता है. गांव के बुजुर्ग का कहना है कि जंगलों की कटाई लगातार बढ़ रही है. पहले चारों तरफ घने जंगल होते थे, जो मौसम को संतुलित रखते थे. अब उनकी जगह मकान और सड़कें बन गई हैं. गाड़ियों का धुआं और बढ़ता प्रदूषण भी मौसम पर असर डाल रहा है.
मई-जून में भी रहती थी ठंडक
गांव के 75 वर्षीय बुजुर्ग धन सिंह ने कहा, ‘हमने अपने बचपन में इतनी गर्मी कभी महसूस नहीं की. पहले मई-जून में भी ठंडक रहती थी, अब पसीना आने लगता है. बर्फ भी साल-दर-साल कम होती जा रही है.’ वहीं, जमुना देवी बताती हैं, ‘पहले बारिश का समय तय रहता था. खेती की तैयारी उसी हिसाब से होती थी. अब कभी सूखा पड़ता है तो कभी अचानक तेज बारिश से फसल खराब हो जाती है.’
बुजुर्गों का मानना है कि अगर हमने प्रकृति का ध्यान नहीं रखा तो आने वाले समय में पहाड़ों का मौसम भी पूरी तरह शहरों जैसा हो जाएगा. उनका कहना है कि हमें पेड़ लगाने चाहिए, जंगलों को बचाना चाहिए और प्रदूषण कम करना चाहिए, तभी पहाड़ों की ठंडक और शुद्ध हवा आने वाली पीढ़ियों को मिल पाएगी.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें
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