झारखंड में पेसा कानून को मंजूरी मिल गई है। अब अधिसूचना जारी होते ही यह कानून प्रदेश के 14 अनुसूचित जिलों में पूरी तरह एक्टिव हो जाएगा। जबकि पलामू, गोड्डा और गढ़वा जैसे जिलों में आंशिक रूप से लागू होगा। इस कानून को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता
यह पूरा कानून पेसा (पंचायत उपबंध, अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 है। अब इसके लागू हो जाने से ग्राम सभा मजबूत होगा। राज्य में स्वशासन, भूमि, खनिज और जल प्रबंधन अब ग्राम सभा के हाथ होगा। इस तरह कानून के लागू होने के साथ ही झारखंड देश के उन 10 राज्यों में शामिल हो गया है, जहां यह एक्टिव है।
इसके लागू होने से क्या-कुछ बदलेगा
- देसी-विदेशी शराब की दुकान ग्राम सभा की अनुमति के बाद ही खुलेगी। किसी भी हाल में निर्णयों की अवहेलना कर शराब की दुकानें नहीं खुलेंगी।
- घर में हुई चोरी, मवेशी चोरी और सामान्य अपराधों की सुनवाई ग्राम सभा करेगी। किसी की जमीन पर कब्जे की कोशिश, हल्की मारपीट जैसे अपराधों की शिकायत मिलने पर ग्राम सभा उसकी सुनवाई करेगी। दो हजार रुपए तक जुर्माना भी कर सकेगी।
- पंचायतों में चल रहे स्कूल या स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन पर भी ग्राम सभा हस्तक्षेप कर सकता है। शिक्षकों, चिकित्सकों, पारा मेडिकल कर्मियों की अनुपस्थिति पर ग्राम सभा कार्रवाई की अनुशंसा करेगी।
- एक एकड़ से कम वाले जल क्षेत्र पर ग्राम सभा का नियंत्रण होगा। ग्राम सभा ही इस क्षेत्र में मछली पालन का निर्णय करेगी। उस तालाब से निकली मछली के उपयोग का फैसला भी ग्राम सभा ही करेगी।
नियमावली की ये है खास बातें
- राज्य के अनुसूचित जिलों की पंचायतों की ग्राम सभाओं की शक्ति और दायित्व बढ़ा।
- पंचायत क्षेत्रों में खनन, जमीन अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होगी।
- ग्राम सभा को लघु वनोपज के उपयोग, स्थानीय क्षेत्र विकास योजना, जल संसाधन प्रबंधन के अधिकार होंगे।
- ग्राम सभाओं के परिसीमन का प्रावधान भी शामिल। इसे जिला प्रशासन अधिसूचित करेगा।
- अनुसूचित जिलों के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों पर पेसा नियमों का प्रभाव नहीं।
- अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को अधिक अधिकार-स्वायत्तता मिलेगी।
- जल, जंगल और जमीन से जुड़े मामलों में स्थानीय ग्राम सभाओं की भूमिका मजबूत होगी।
- आदिवासी बहुल क्षेत्रों में निर्णय प्रक्रिया ज्यादा लोकतांत्रिक बनेगी। विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय सहभागिता बढ़ेगी।
पेसा कानून का राज्य में पहले भी दो बार बना था ड्राफ्ट
केंद्र सरकार ने वर्ष 1996 में पेसा कानून लागू किया था। इसका उद्देश्य राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों के हितों की सुरक्षा करना था, लेकिन एकीकृत बिहार में इसकी नियमावली नहीं बनाई गई। वर्ष 2019 और 2023 में नियमावली का ड्राफ्ट तैयार किया गया था, लेकिन लागू नहीं किया गया।
इसके बाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। वर्ष 2024 में मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार काे 2 माह के अंदर पेसा नियमावली लागू करने का निर्देश दिया था।
पेसा नियमावली के अनुसार ग्राम सभा का गठन होगा और प्रत्येक माह कम से कम एक बैठक होगी। ग्राम सभा के दसवें हिस्से या आधे सदस्यों की लिखित मांग पर ग्राम प्रधान को सात दिनों के भीतर बैठक बुलानी होगी।
बैठक के कोरम के लिए ग्राम सभा के कुल सदस्यों के एक-तिहाई उपस्थिति अनिवार्य होगा। झारखंड पंचायती राज अधिनियम-2001 के प्रावधान पहले से ही पेसा के अनुरूप हैं। इसलिए पंचायत चुनाव पर इसका असर नहीं पड़ेगा।
पेसा कानून को प्रभावी तरीके से किया जाएगा लागू
कैबिनेट की बैठक के बाद प्रोजेक्ट भवन में मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि पेसा कानून को राज्य में प्रभावी तरीके से लागू किया जाएगा। पेसा कानून की नियमावली को व्यापक विमर्श और विभिन्न विभागों के साथ गहन मंथन के बाद अंतिम रूप दिया गया है। यह नियमावली अब राज्य की जनता को समर्पित की जा रही है। जमीनी स्तर पर इसका बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सभी पहलुओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
इन जिलों में लागू होगा पेसा कानून
रांची, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला खरसावां, साहेबगंज, दुमका, पाकुड़, जामताड़ा। इसके साथ ही पलामू जिले के सतबरवा ब्लॉक के रबदा और बकोरिया पंचायत, गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी और बोरिजोर ब्लॉक में यह कानून लागू होगा।
पेसा एक्ट यानी पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996
पेसा एक्ट यानी पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 आदिवासी बहुल इलाकों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के लिए बनाया गया कानून है। यह कानून संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों में लागू होता है।
वर्तमान में देश के 10 राज्य आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में लागू है। इन राज्यों के उन जिलों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है, जहां आदिवासी आबादी अधिक है।
क्यों पड़ी पेसा एक्ट की जरूरत
आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि सामान्य पंचायती राज व्यवस्था वहां की सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक संरचना के अनुरूप नहीं है। इन इलाकों में भूमि, जंगल, जल और खनिज संसाधन जीवन का आधार हैं। लेकिन विकास के नाम पर लिए गए कई फैसलों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी नहीं होती थी। इसी कमी को दूर करने के लिए पेसा एक्ट लाया गया, ताकि निर्णय लेने की शक्ति सीधे ग्राम सभा के हाथ में हो।
पेसा एक्ट के तहत ग्राम सभा को सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया है। ग्राम सभा को जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास, खनन, शराब बिक्री, लघु वन उपज के प्रबंधन और पारंपरिक संसाधनों की सुरक्षा जैसे मामलों में निर्णायक भूमिका दी गई है। किसी भी विकास परियोजना से पहले ग्राम सभा की सहमति जरूरी होती है। इससे आदिवासी समुदाय अपने हितों की रक्षा खुद कर सकता है।
पेसा एक्ट का मूल उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था, पंचायती राज प्रणाली और आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है। यह कानून केवल शासन का ढांचा नहीं बदलता, बल्कि आदिवासी समाज को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार करता है। सही मायनों में लागू होने पर पेसा एक्ट आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक मजबूत कर सकता है।
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