Rajya Sabha Chunav 2026: राज्यसभा चुनाव से पहले उपेंद्र कुशवाहा की सियासी हलचल तेज हो गई है. बिहार की 5 सीटों को लेकर उम्मीदवारों के चयन से पहले अमित शाह ने उन्हें दिल्ली बुलाया है, जिससे आरएलएम के बीजेपी में विलय की चर्चाओं को बल मिला है. कुशवाहा पहले भी भाजपा कोटे से राज्यसभा जा चुके हैं और उनकी पार्टी के केवल 4 विधायक हैं, ऐसे में अकेले दम पर दोबारा जाना मुश्किल माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक भाजपा ने विलय का प्रस्ताव रखा है. अब सबकी नजर इस पर है कि कुशवाहा प्रस्ताव स्वीकार करते हैं या अलग राह चुनते हैं.
उपेंद्र कुशवाहा को फिर से राज्यसभा का टिकट मिल सकता है.
BJP ने हर बार कुशवाहा उबारा है
4-5 सीटों से RS जाना संभव नहीं
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के अभी 4 विधायक हैं. अब तक के रिकार्ड के आधार पर कहा जा ससकता है कि आगे भी वे बहुत बढ़े तो चिराग पासवान के बराबर या उससे दो-चार अधिक सीटों तक पहुंच सकते हैं. वैसे अकेले नीतीश कुमार भी भाजपा के बिना कुछ कर नहीं पाते तो उपेंद्र कुशवाहा की औकात ही क्या है. ऐसे में अपने बूते वे कितनी सीटें ला पाएंगे, सहज अनुमान लगाया जा सकता है. अकेले लड़ कर वे 2019 के लोकसभा और 2020 के विधानसभा चुनाव में देख चुके हैं. नीतीश कुमार ने दरियादिली न दिखाई होती तो अपने दम पर एमएलसी भी नहीं बन पाते. उनकी ताकत क्या है, यह इससे भी पता चलता है कि सहयोग के बावजूद वे अपने दम पर 2024 का संसदीय चुनाव नहीं जीत पाए. भाजपा के साथ रहने का फायदाउन्हें अच्छे से पता है.
दूध जले को मट्ठे से भी लगता भय
दरअसल उपेंद्र कुशवाहा के सामने कश्मकश यह है कि विलय के बावजूद नीतीश ने उनकी महत्वाकांक्षा पर पानी फेर दिया था. जेडीयू कोटे से महागठबंधन सरकार में मंत्री बनने की उनकी तमन्ना धरी रह गई. मन ही मन नीतीश का विकल्प बनने का सपना देखने वाले कुशवाहा ने उनके ही फैसलों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए तो नीतीश ने भी उन्हें उनकी औकात बताने में देर नहीं की. नतीजतन जेडीयू से निकल कर उन्हें अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी. भाजपा ने उन्हें फिर विलय का प्रस्ताव दिया है. अनुमान है कि वे भाजपा के प्रस्ताव को खारिज नहीं करेंगे.
शर्तें न मानने पर हो सकता है घाटा
भाजपा की शर्तें न मानने पर कुशवाहा को कोई लाभ नहीं होगा. प्रस्ताव नकारने पर उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है. उनके राज्यसभा जाने की संभावना तो खत्म हो ही जाएगी, बेटे का मंत्री पद भी खतरे में पड़ जाएगा. वैसे भी बिना किसी सदन का सदस्य बने उन्हें मंत्री पद मिला है. इससे उन्होंने एनडीए के दूसरे दलों के सामने नैतिक संकट खड़ा कर दिया है. पत्नी और पुत्र के मोह में फंसे कुशवाहा के सामने उनके 3 विधायक भी संकट बने हुए हैं. कुछ ही दिनों पहले कुशवाहा से नाराज इन विधायकों ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात भी थी. इसके अलावा भी इन विधायकों के कई ऐसे नखरे रहे हैं, जिससे पता चलता है कि उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाले आरएलएम में वे घुटन महसूस कर रहे हैं. भाजपा चाहे तो आसानी से उनके तीनों विधायकों को अपने पाले में कर सकती है.
कुशवाहा के सामने अब रास्ता क्या?
ऐसे में कुशवाहा के लिए यही मुफीद होगा कि वे भाजपा के साथ जाएं. यानी आरएलएम का विलय भाजपा में कर दें. भाजपा में रह कर उनको कई लाभ मिलेंगे. अपने कामों से अगर उन्होंने प्रभावित किया तो कई संभावनाओ के द्वार खुल जाएंगे. सम्राट चौधरी के बाद बिहार भाजपा में दूसरा कोई बड़े कद का कुशवाहा नेता नहीं है. साथ आए तो तत्काल उन्हें यह जगह मिल जाएगी. भाजपा की कृपा बरसी तो उन्हें सम्राट के ऊपर या बराबर पर बिठाया जा सकता है. यानी भाजपा संग जाने पर उन्हें राज्यसभा की सांसदी पिछली बार के 2 साल की जगह इस बार 6 साल के लिए मिल जाएगी. मंत्री रह चुके हैं और अपनी पार्टी का विलय कर साथ आते हैं तो इस बार भी मोदी कैबिनेट में मंत्री का उनका नैतिक हक तो बनता ही है. बेटे के एमएलसी बनने में भी आसानी होगी. यानी बेटे का मंत्री पद बरकरार रहेगा. नाराज विधायकों को भी भाजपा मंत्री या कोई दूसरा पद दे सकती है.
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A Multimedia Journalist having experience of more than 14 years in mainstream media Industry. Currently Working with Network 18 Media & Investment Limited for News18 Hindi Website as a Chief Sub Editor. He …और पढ़ें
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