पहले उपेंद्र कुशवाहा का नाम चर्चा में था
दरअसल, राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक चर्चाओं में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा का नाम पांचवें उम्मीदवार के रूप में सामने आ रहा था. माना जा रहा था कि NDA गठबंधन के भीतर सहयोगी दलों को संतुलित करने के लिए उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है. बता दें कि उपेंद्र कुशवाहा पहले भी राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं और बिहार की राजनीति में कुशवाहा समाज के बड़े नेता माने जाते हैं. यही वजह थी कि कई राजनीति के जानकार यह मान रहे थे कि NDA उन्हें पांचवें उम्मीदवार के रूप में आगे कर सकता है. इसका दूसरा पहलू यह भी था कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ मिलकर गठबंधन में चुनाव लड़ा था. ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे कि अपने इस संबंधों का वह उपयोग कर सकते हैं और एआईएमआईएम के पांच विधायकों का समर्थन जुटा सकते हैं.
अचानक शिवेश राम का नाम क्यों आया?
लेकिन, इसी बीच राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आए और NDA की ओर से शिवेश राम का नाम सामने आ गया. जदयू विधायक रत्नेश सदा ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि शिवेश राम ही पांचवें उम्मीदवार हैं और उनकी जीत तय है. इस बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया कि NDA के भीतर उम्मीदवारों को लेकर नई रणनीति बनाई गई है. माना जा रहा है कि सामाजिक समीकरण और दलित प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया हो सकता है.
NDA की रणनीति और सामाजिक समीकरण
राजनीति के जानकार कहते हैं कि बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा अहम भूमिका निभाते हैं. राजनीतिक दल उम्मीदवार तय करते समय जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हैं. ऐसे में शिवेश राम का नाम सामने आना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि NDA अपने सामाजिक आधार को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. खासकर दलित समुदाय में राजनीतिक संदेश देने की रणनीति के तौर पर इसे देखा जा रहा है.
शिवेश राम क्यों बने पाचवें प्रत्याशी?
शिवेश राम भोजपुर के अगिआंव से पूर्व विधायक हैं. वे दलित समुदाय से आते हैं और पार्टी में लंबे समय से काम कर रहे हैं. राजनीति के जानकारों के मुताबिक, संभव है कि एनडीए के रणनीतिकारों ने सोचा कि दलित चेहरा शिवेश राम को आगे बढ़ाने से लोजपा के 19 और हम के 5 विधायकों का पूरा समर्थन मिल जाएगा. इससे पांचवें प्रत्याशी को 38 वोट के अलावा अतिरिक्त वोट आसानी से मिल सकते हैं. शिवेश राम को 38 वोट आवंटित किए गए और बाकी तीन वोट का जुगाड़ कांग्रेस, बसपा या अन्य विधायकों से किया जा रहा है. एनडीए का दावा है कि पांच से ज्यादा अतिरिक्त वोट उसके पास हैं.
पांचवीं सीट क्यों बनी दिलचस्प?
बिहार में राज्यसभा की सीटों का गणित ऐसा है कि चार उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन पांचवीं सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है. संभवत: कि इसी वजह से NDA के भीतर पांचवें उम्मीदवार को लेकर रणनीतिक फैसला लिया जा रहा है. राजनीतिक दल चाहते हैं कि ऐसा उम्मीदवार सामने आए जो गठबंधन के वोटों को एकजुट रख सके और जीत सुनिश्चित कर सके. जदयू विधायक रत्नेश सदा का दावा है कि शिवेश राम की जीत तय है, लेकिन विपक्ष भी अपनी रणनीति बनाने में जुटा है.
अंदरखाने की राजनीति क्या कहती है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पांचवें उम्मीदवार को लेकर NDA के भीतर कई स्तर पर चर्चा हुई है. सहयोगी दलों को संतुष्ट करना, सामाजिक संतुलन बनाए रखना और चुनावी संदेश देना जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला किया गया है. इसी वजह से पहले उपेंद्र कुशवाहा का नाम चर्चा में था, लेकिन बाद में समीकरण बदलने के बाद शिवेश राम को आगे किया गया. जानकार कहते हैं कि बिहार का राज्यसभा चुनाव केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके जरिए राज्य की राजनीति के अंदरूनी समीकरण भी साफ नजर आने लगे हैं.
अंदरखाने की पूरी कहानी जान लीजिए
राजनीति के जानकार बताते हैं कि एनडीए के अंदर यह बदलाव सिर्फ वोटों का गणित नहीं बल्कि राजनीतिक समझौता है. उपेंद्र कुशवाहा को चौथे स्लॉट पर रखकर उनकी जीत पक्की कर दी गई, इससे रालोमो खुश हो गया. लेकिन लोजपा और हम के नाराजगी दूर करने के लिए दलित नेता शिवेश राम को पांचवें बनाया गया. जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के दल अब दलित सांसद बनाने के लिए उत्सुक हैं. इससे एनडीए की एकता बनी रहेगी और कोई विद्रोह नहीं होगा. सूत्र बताते हैं कि यह रणनीति नीतीश कुमार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मिली-जुली कोशिश का नतीजा है.
वोटों का गणित और जीत की गारंटी
बता दें कि बिहार विधानसभा में 243 सदस्य हैं. एक सीट जीतने के लिए 41 वोट चाहिए. एनडीए के पास 202 विधायक हैं. चार प्रत्याशियों को 41-41 यानी 164 वोट दिए गए. बचे 38 वोट शिवेश राम को मिलेंगे. लोजपा हम और रालोमो के 28 वोट भी जुड़ेंगे. बाकी तीन वोट का इंतजाम गैर एनडीए से किया गया. एनडीए का कहना है कि विपक्ष एकजुट नहीं हो पाएगा. राजद का एक प्रत्याशी है लेकिन महागठबंधन के 41 वोट पूरे नहीं हो पाएंगे. रत्नेश सदा जैसे जेडीयू विधायकों ने कहा कि सब कुछ प्लान के मुताबिक चल रहा है और शिवेश राम की जीत में कोई शक नहीं.
एनडीए की रणनीति और राजनीति का संदेश
जानकारों की नजर में यह पूरा खेल एनडीए की मजबूत रणनीति दिखाता है. पांचवें प्रत्याशी को बदलकर छोटे सहयोगी दलों को संतुष्ट किया गया. दलित कार्ड खेलकर सामाजिक समीकरण साधे गए. अब कल मतदान है और एनडीए दावा कर रहा है कि पांचों सीटें उसकी झोली में. रत्नेश सदा का बयान जहां इसी आत्मविश्वास को दिखाता है, वहीं बिहार की राजनीति में यह फैसला एनडीए की एकता को और मजबूत करता हुआ प्रतीत हो रहा है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एनडीए का यह अंदरूनी पेच सुलझ चुका है और अब सिर्फ जीत का इंतजार है. अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्यसभा चुनाव में NDA की रणनीति कितनी सफल होती है.
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