300 मीटर की दूरी और सत्ता की नई पटकथा!
सियासत यह संयोग या फिर संकेतों की राजनीति?
राजनीति के गलियारों में नीतीश कुमार की उस चहलकदमी की आज भी चर्चा होती है और कहा जाता है कि यहां 300 मीटर की दूरी में सिर्फ सड़क नहीं थी, बल्कि राजनीति का संदेश लिखा था. लेकिन, वक्त बदला और दौर भी बदल गया तो अब वही दूरी बढ़ गई- मगर क्यों? आज बात फिर उसी बंगले की है. लेकिन इस बार कहानी उल्टी है-पास आने की नहीं, दूर जाने की है. सरकार के नए आदेश के बाद नीतीश कुमार के आधिकारिक आवास और राबड़ी देवी के आवास की दूरी 300 मीटर नहीं अब 500 मीटर बढ़ जाएगी और यह 800 मीटर हो जाएगी. राजनीति के जानकार साफ-साफ कहते हैं कि यह 500 मीटर की दूरी नहीं, बल्कि बढ़ा हुआ राजनीतिक फासला है.
पटना 10 सर्कुलर रोड राबड़ी देवी का बंगला खाली करने का नोटिस, नीतीश कुमार और लालू यादव की बढ़ती राजनीतिक दूरी की कहानी,
क्या ये सिर्फ आवास आवंटन की तकनीकी प्रक्रिया है?
राजनीति के गलियारों में बंगले को लेकर सवाल है- क्या ये राजनीतिक संकेत है? बहुतों का मानना है-हां, राबड़ी देवी का बंगला, जो सिर्फ बंगला नहीं इस बंगले में लालू प्रसाद यादव की वापसी की योजनाएं बनीं, तेजस्वी यादव की राजनीतिक यात्रा की नींव पड़ी और इसी जगह से नीतीश कुमार के साथ रिश्ते- कभी गर्मजोशी, कभी चुप्पी, कभी वैमनस्य और कभी संघर्ष के बीच झूलते रहे. और आज, वही बंगला चर्चा में है, क्योंकि अब वहां रहने के अधिकार और नियम पर विवाद चल रहा है.
…तो अब क्या संदेश है?
जो लोग बिहार की राजनीति को पास से देखते हैं, वे कहते हैं-राजनीति में कुछ फैसले फाइलों में नहीं, फासलों में पढ़े जाते हैं. 300 मीटर की नजदीकी ने कभी सत्ता पलट दी थी. अब 800 मीटर की दूरी क्या बदलती है- ये आने वाला समय बताएगा. आखिर में-ये सिर्फ सड़क की दूरी बढ़ने का मामला नहीं, ये कहानी सिर्फ दो घरों की दूरी की नहीं है, ये कहानी है- राजनीतिक संकेतों की, बदलते समीकरणों की और उस अदृश्य धागे की जो राजनीतिक रिश्तों को जोड़ता और तोड़ता है.
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