यह लाइब्रेरी बिहार की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संस्थाओं में से एक मानी जाती है. इसकी स्थापना वर्ष 1924 में प्रसिद्ध शिक्षाविद और संविधान सभा के प्रथम अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी पत्नी राधिका सिन्हा की स्मृति में की थी. उन्होंने अपनी पत्नी की पैतृक संपत्ति बेचकर मिले पैसों से इस लाइब्रेरी की शुरुआत की थी.
सिन्हा लाइब्रेरी केस में नीतीश को झटका
ट्रस्ट से उसकी संपत्ति लेना संविधान के खिलाफ
यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 10 मार्च 2026 को अनुराग कृष्ण सिन्हा बनाम बिहार राज्य मामले में सुनाया. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बिना उचित प्रक्रिया और पर्याप्त मुआवजे के किसी ट्रस्ट से उसकी संपत्ति लेना संविधान के खिलाफ है.
करीब सौ साल पुरानी है यह लाइब्रेरी
यह लाइब्रेरी बिहार की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संस्थाओं में से एक मानी जाती है. इसकी स्थापना वर्ष 1924 में प्रसिद्ध शिक्षाविद और संविधान सभा के प्रथम अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी पत्नी राधिका सिन्हा की स्मृति में की थी. उन्होंने अपनी पत्नी की पैतृक संपत्ति बेचकर मिले पैसों से इस लाइब्रेरी की शुरुआत की थी. समय के साथ यह संस्था एक बड़े सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में विकसित हुई, जिसमें करीब 1.8 लाख किताबों का संग्रह है. वर्ष 1955 में बिहार सरकार और ट्रस्ट के बीच हुए एक समझौते में ट्रस्ट के स्वामित्व को मान्यता दी गई थी और सरकार ने वित्तीय सहायता देने की भी बात कही थी.
सरकार के अधिग्रहण की कोशिश पर शुरू हुआ विवाद
लाइब्रेरी को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश पहली बार 1983 में की गई थी, जब बिहार सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया था. हालांकि बाद में यह अध्यादेश खत्म हो गया और मामला अदालत में चला गया. इसके बाद 2015 में नीतीश सरकार ने नया कानून बनाकर लाइब्रेरी के प्रबंधन को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया. इस कानून को ट्रस्ट की ओर से अदालत में चुनौती दी गई थी. पहले पटना हाइकोर्ट में इस पर सुनवाई हुई और बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द कर दिया.
ट्रस्ट को वापस मिला लाइब्रेरी का प्रबंधन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कानून रद्द होने के बाद लाइब्रेरी का पूरा प्रबंधन और अधिकार फिर से ट्रस्ट को सौंप दिया जाए. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार चाहें तो वित्तीय सहायता और प्रशासनिक सहयोग जारी रख सकती है. इस फैसले को बिहार की एक ऐतिहासिक संस्था से जुड़े लंबे कानूनी विवाद का अहम पड़ाव माना जा रहा है. वहीं, इसे सरकारों द्वारा संस्थाओं के अधिग्रहण से जुड़े मामलों में न्यायपालिका का महत्वपूर्ण संदेश भी माना जा रहा है. साथ ही इस फैसले को नीतीश सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें
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