अपनी बात को नीतीश कुमार ने भरे सदन में तब जिस अंदाज में रखा वह आज भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहता है, “मैं ग्रामीण क्षेत्र से आता हूं… जब गांव में पहुंचता हूं तो भारी संख्या में निर्वस्त्र, अधनंगे, भूखे-प्यासे बच्चे दौड़ते हैं. उन्हें देखकर भय लगता है. उस समय सोचता हूं, इस मुल्क का क्या होगा? ये बच्चे बड़े होकर युवा बनेंगे, बच्चे पैदा करेंगे… ये खाएंगे कहां से, पहनेंगे कहां से? गांव में स्कूल नहीं, स्कूल है तो भवन नहीं, भवन है तो शिक्षक नहीं… योजनाएं बहुत हैं, अमल कोई नहीं.” नीतीश कुमार की इस बात पर सदन में सन्नाटा छा गया. नीतीश कुमार की आंखों में आंसू थे, आवाज में दर्द. उस दिन शायद नीतीश ने मन ही मन ठान लिया था, अगर कभी सत्ता मिली तो ये अधनंगे बच्चे ही सबसे पहले कपड़े पहनेंगे, इन्हीं के हाथ में किताब होगी.
CMP बनाम गांव की सच्चाई
न्यूनतम साझा कार्यक्रम में गरीबी उन्मूलन, ग्रामीण विकास और बुनियादी न्यूनतम आवश्यकताएं (Basic Minimum Needs) पर जोर था. सरकार इसे गरीबों के लिए रोडमैप बता रही थी. लेकिन नीतीश कुमार ने सवाल उठाया कि कागज पर लिखी बात जमीन पर क्यों नहीं दिखती. उन्होंने कहा कि गांवों में प्रवेश करते ही अधनंगे, भूखे प्यासे बच्चों की भीड़ दिखती है. यह दृश्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नीति और अमल के बीच की खाई को उजागर करता है.
तर्क केवल बिहार नहीं, पूरे देश के लिए
नीतीश कुमार ने सदन में कहा कि योजनाओं की कमी नहीं है. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (Minimum Needs Programme) पहले से चल रहा है. नई सरकार ने भी बेसिक मिनिमम नीड्स का जिक्र किया है. लेकिन असली सवाल है कि अमल कैसे होगा? गांव में स्कूल नहीं है. स्कूल है तो भवन नहीं. भवन है तो शिक्षक नहीं. यह तर्क केवल बिहार नहीं, बल्कि देश के कई पिछड़े इलाकों पर लागू होता था. दरअसल, किसी भी सरकार की उपलब्धियों और कमियों के बीच सच यही है कि विकास एक लंबी प्रक्रिया है, और उसका पैमाना केवल घोषणा नहीं, बल्कि गांव की बदली हुई तस्वीर होती है.
बहस का स्वर और असर
नीतीश कुमार का उस दिन का भाषण लगभग दस मिनट का था. स्वर तीखा था, लेकिन भाषा सरल. नीतीश कुमार ने खुद को ग्रामीण पृष्ठभूमि से जोड़ते हुए कहा कि वे जब अपने क्षेत्र में जाते हैं तो बच्चों की भीड़ देखकर भविष्य को लेकर चिंता होती है. ये बच्चे कुछ साल बाद युवा बनेंगे. उनके लिए शिक्षा, भोजन और रोजगार का इंतजाम नहीं होगा तो देश पर बोझ बढ़ेगा. सरकार की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा (H. D. Deve Gowda) ने CMP को गरीब समर्थक कार्यक्रम बताया. लेकिन, विपक्ष के सवालों का सीधा और विस्तार से जवाब उस बहस में नहीं मिल पाया, परन्तु यह बहस आगे की राजनीति के लिए संदर्भ बिंदु बन गई.
2005 के बाद: सत्ता और नीतियों का दौर
समय बदला तो राजनीतिक परिदृश्य भी बदला और नवंबर 2005 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. इसके बाद राज्य में शिक्षा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं पर फोकस बढ़ा. 2007 में शुरू हुई साइकिल योजना का मकसद था कि नौवीं कक्षा की छात्राएं स्कूल जाएं. बाद में यह योजना लड़कों के लिए भी लागू हुई. इस योजना का असर नामांकन और उपस्थिति दर में दिखा. पोशाक योजना के तहत सरकारी स्कूल के बच्चों को यूनिफॉर्म के लिए राशि दी जाने लगी. इससे स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और सामाजिक सम्मान दोनों बढ़े. शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2005 के बाद प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों की संख्या और भवनों में विस्तार हुआ. शिक्षक नियुक्तियां भी बड़े पैमाने पर हुईं, हालांकि गुणवत्ता को लेकर बहस जारी रही.
महादलित और जीविका मॉडल
वर्ष 2007 में राज्य सरकार ने महादलित श्रेणी बनाई. अनुसूचित जाति के भीतर सबसे पिछड़े समूहों की पहचान कर उन्हें विशेष योजनाओं का लाभ देने की नीति बनी. जमीन पट्टा, आवास और छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं इसी फोकस के साथ जोड़ी गईं. महिला सशक्तिकरण के लिए स्वयं सहायता समूहों का विस्तार किया गया. जीविका मॉडल के तहत लाखों महिलाएं समूह से जुड़ीं. उन्हें बैंक लोन, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने की कोशिश हुई. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. स्पष्ट है कि 2005 के बाद की नीतियां उसी बहस की निरंतरता के रूप में देखी जा सकती हैं.
7 निश्चय और बुनियादी ढांचा
2015 के बाद 7 निश्चय कार्यक्रम की घोषणा हुई. इसमें हर घर नल का जल, हर घर शौचालय, पक्की गली नाली और युवाओं के लिए कौशल विकास जैसे बिंदु शामिल थे. सरकारी दावों के अनुसार पेयजल और शौचालय कवरेज में तेजी आई. ग्रामीण सड़कों और पुलों का नेटवर्क भी विस्तारित हुआ. हालांकि, विपक्ष ने इन योजनाओं के क्रियान्वयन और गुणवत्ता पर सवाल उठाए. कई जगह पानी आपूर्ति की अनियमितता, स्कूलों में शिक्षकों की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर आलोचना हुई. लेकिन यह भी सच है कि 2005 के पहले और बाद की आधारभूत स्थिति में अंतर को कई स्वतंत्र अध्ययन भी पुष्ट करते हैं.
1996 का भाषण, 2025 की राजनीति
दरअसल, 2025 में जब नीतीश कुमार ने दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली तो 1996 का उनका भाषण आज भी सोशल मीडिया पर चर्चा में रहता है. समर्थकों ने इसे दूरदर्शिता बताया. आलोचकों ने कहा कि अब भी गरीबी, पलायन और रोजगार जैसे मुद्दे पूरी तरह हल नहीं हुए. वास्तविकता यह है कि बिहार की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां गहरी हैं. प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन के मामले में राज्य अब भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है. लेकिन शिक्षा में नामांकन, बालिका शिक्षा, पंचायतों में महिला आरक्षण और सड़कों के विस्तार जैसे क्षेत्रों में बदलाव दर्ज हुए हैं.
सवाल अमल का ही रहा
हालांकि, 28 नवंबर 1996 को लोकसभा में उठाया गया सवाल आज भी प्रासंगिक है. योजनाएं बनाना आसान है. असली चुनौती उन्हें जमीन पर लागू करना है. नीतीश कुमार का उस समय का कथन कि कमी अमल की है, भारतीय लोकतंत्र की स्थायी बहस का हिस्सा है. करीब तीन दशक बाद भी गांव, शिक्षा, गरीबी और रोजगार राजनीति के केंद्र में हैं. फर्क इतना है कि अब बहस केवल भाषण तक सीमित नहीं रहती. सोशल मीडिया, डेटा और जमीनी रिपोर्टिंग उसे लगातार जांचते रहते हैं. वर्ष 1996 का लोकसभा वह दृश्य एक राजनीतिक बयान भर नहीं था. वह उस दौर की ग्रामीण हकीकत का दस्तावेज था.
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