बिल गेट्स फाउंडेशन भारत में कर रहा एक्सपेरिमेंट: सुधाकर सिंह
सुधाकर सिंह ने कहा कि बृजेश पाठक तत्कालीन अध्यक्ष स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय राज्यसभा की संसदीय स्थाई समिति के संस्था में 30 अगस्त 2013 को समिति का 72वां रिपोर्ट प्रकाशित किया, जिसमें गेट्स फाउंडेशन के द्वारा फंडेड गर्भाशय ग्रीवा कैंसर एच पी वि वैक्सीनेशन परिणाम और उससे हुई मौत का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया है. सुधाकर सिंह ने कहा कि बिल गेट्स फाउंडेशन भारत में दान के नाम पर अपने दवाइयां का एक्सपेरिमेंट कर रहा है. और इस काम में भारत के अधिकारी शामिल है बिहार राज्य में भी एचपीवी वैक्सीन का उपयोग बिहार की स्कूल की बच्चियों पर किया गया है, जिसको लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मैंने जानकारी भी दी है मगर अभी तक मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिला है.
‘भारत के कई अधिकारी भी शामिल रहे’
सुधाकर सिंह ने अपने बयान में कहा कि वैक्सीनेशन कार्यक्रम के दौरान कुछ बच्चियों की मौत और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं के मामले सामने आए थे. उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब दान और स्वास्थ्य सेवा के नाम पर किया गया और इसमें भारत के कई अधिकारी भी शामिल रहे. इस मुद्दे पर उन्होंने 30 अगस्त 2013 को प्रकाशित संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया. उनके अनुसार उस समय समिति से जुड़े बृजेश पाठक के कार्यकाल में प्रस्तुत रिपोर्ट में वैक्सीनेशन कार्यक्रम और उसके परिणामों को लेकर सवाल उठाए गए थे. रिपोर्ट में टीकाकरण की प्रक्रिया, निगरानी व्यवस्था और अनुमति प्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की गई थी.
HPV वैक्सीनेशन से पहले भी जुड़ा विवाद
दरअसल, HPV वैक्सीनेशन से जुड़ा विवाद नया नहीं है. वर्ष 2009 में स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम के तहत PATH नाम की संस्था ने सरकारी एजेंसियों के सहयोग से पायलट प्रोजेक्ट चलाया था. यह कार्यक्रम मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और गुजरात में स्कूली छात्राओं के बीच लागू किया गया था. बाद में कुछ मौतों और प्रक्रियागत खामियों के आरोप सामने आए, जिसके बाद इस कार्यक्रम को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो गई थी और जांच भी बैठाई गई थी.
सुधाकर सिंह ने की जांच की मांग
सुधाकर सिंह ने यह भी दावा किया कि बिहार में भी बच्चियों को वैक्सीन दिए जाने के मामलों की जांच होनी चाहिए. उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है. फिलहाल इन आरोपों पर संबंधित संस्थाओं या सरकार की ओर से कोई नई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक और स्वास्थ्य नीति के स्तर पर यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है.
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