दांव पर है एनडीए की प्रतिष्ठा
एनडीए के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का बड़ा मुद्दा बन गया है. बिहार विधानसभा में एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं (भाजपा 89, जदयू 85 और बाकी सहयोगी दलों के). राज्यसभा की 1 सीट जीतने के लिए 41 वोट जरूरी हैं. एनडीए की मजबूत संख्या से 4 उम्मीदवार- नीतीश कुमार (जेडीयू), नितिन नवीन (भाजपा), रामनाथ ठाकुर (जेडीयू) और शिवेश कुमार राम (भाजपा) आराम से जीत जाएंगे. पर, 5वीं सीट पर उपेंद्र कुशवाहा (आरएलएम) को राज्यसभा पहुंचाने के लिए एनडीए को 3 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है, जो क्रॉस-वोटिंग या बाहरी समर्थन से ही संभव है. एनडीए के लिए सभी 5 सीटें जीतना प्रतिष्ठा का सवाल है, क्योंकि यह नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार की ताकत और भाजपा के साथ गठबंधन की मजबूती दिखाएगा. अगर 5वीं सीट छूट गई, तो विपक्ष इसे एनडीए की कमजोरी के रूप में पेश करेगा. ऐसा हुआ तो एनडीए की एकजुटता पर भी सवाल उठ सकते हैं. एनडीए की रणनीति अब उन छोटे दलों के विधायकों पर केंद्रित है, जिनमें AIMIM के 5 और बसपा के 1 विधायक प्रमुख हैं.
नितिन नवीन की अग्निपरीक्षा
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए यह चुनाव अग्निपरीक्षा है. हाल ही में भाजपा अध्यक्ष बने नवीन को बिहार से राज्यसभा भेजा जा रहा है, जो उनकी राजनीतिक छवि को मजबूत करने का अवसर है. लेकिन 5वीं सीट की जंग में अगर एनडीए को सफलता नहीं मिली, तो यह नवीन के नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर सकता है. नवीन की उम्मीदवारी से भाजपा ने बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करने का संदेश दिया है, लेकिन गठबंधन में जेडीयू के साथ समन्वय और छोटे दलों को साधने की जिम्मेदारी भी नवीन पर है. एनडीए में पहले से ही टिकट वितरण को लेकर असंतोष की खबरें हैं, जहां चिराग पासवान जैसे नेताओं के बीच असहमति दिखी. जीतन राम मांझी भी 4 विधायकों की बदौलत सीट मांग रहे थे. नवीन को यह सुनिश्चित करना है कि 4 सीटों पर जीत के साथ 5वीं सीट भी एनडीए के खाते में आए, ताकि उनकी राष्ट्रीय छवि पर कोई दाग न लगे. यह उनके लिए बिहार भाजपा को एकजुट रखने और गठबंधन की साख बचाने का टेस्ट है.
तेजस्वी की रणनीति की परख
विपक्षी महागठबंधन (MGB) के लिए यह चुनाव तेजस्वी यादव की रणनीति की कड़ी परीक्षा है. MGB के पास कुल 35 विधायक हैं (आरजेडी 25, कांग्रेस 6, वाम दल और आईआईपी सहित 4). अमरेंद्र धारी सिंह को जिताने के लिए उन्हें कम से कम 6 अतिरिक्त वोट चाहिए. तेजस्वी ने विधायकों की बैठक बुला कर वोटिंग प्रक्रिया समझाई है और छोटे दलों पर फोकस किया है. तेजस्वी की रणनीति AIMIM (5 विधायक) और बसपा (1 विधायक) को साधने पर टिकी है. ये सध गए तो तेजस्वी एनडीए पर भारी पड़ जाएंगे. असदुद्दीन ओवैसी की विधायक तोड़ने के कारण AIMIM और MGB के बीच पुरानी कड़वाहट को भुला कर समर्थन जुटाना चुनौतीपूर्ण है. तेजस्वी ने दावा किया है कि उनकी रणनीति मजबूत है और MGB 5वीं सीट जरूर जीतेगा. लेकिन महागठबंधन अगर यह सीट हार गया, तो तेजस्वी की विपक्षी एकता और रणनीतिक कौशल पर सवाल उठेंगे. यह उनके भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है.
5वीं सीट तय करेगी एकजुटता
एनडीए का गणित यह है कि 202 विधायकों के सहारे 4 उम्मीदवार तो आसानी से जीत जाएंगे. 5वीं सीट के लिए सरप्लस वोटों को ट्रांसफर करेंगे और 3 अतिरिक्त वोट का बंदोबस्त विपक्षी महागठबंधन में सेंधमारी कर हासिल कर लेंगे. एनडीए की नजर कांग्रेस, AIMIM और बसपा विधायकों की क्रॉस वोटिंग पर है. AIMIM विधायकों के नीतीश कुमार से अच्छे संपर्क-संबंध की चर्चा भी होती रही है. MGB का गणित है कि 35 विधायकों तो हैं ही, 6 और वोट चाहिए. तेजस्वी की कोशिश AIMIM के 5 और बसपा के 1 को जोड़ कर जरूरी 41 वोटों तक पहुंचने की है. हालांकि AIMIM का राजद से पुराना विवाद है. बसपा विधायक भी आरजेडी का बागी होकर चुनाव लड़ा था. उसने भी धोखा दे दिया तो खेल बिगड़ सकता है.
जानिए 3 और 6 वोट का खेल
3 बनाम 6 का खेल छोटे दलों की शक्ति दिखाता है, जहां एक-एक वोट निर्णायक है. संदेह के घेरे में कांग्रेस विधायक हैं. कांग्रेस के 6 विधायक हैं. कांग्रेस के महागठबंधन में रहने के कारण तेजस्वी को इनके अटूट रहने का पूरा भरोसा है. केंद्र में कांग्रेस की स्थिति कमजोर है और कुछ विधायकों पर एनडीए से संपर्क की अफवाहें भी हैं. यानी कांग्रेस विधायकों की निष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं. तेजस्वी की बैठक में कांग्रेस विधायकों को एकजुट रखना चुनौती है. अगर इनमें से एक-दो वोट क्रॉस हो गए, तो तेजस्वी का पूरा गणित बिगड़ सकता है. कांग्रेस के लिए भी यह प्रतिष्ठा का सवाल है, क्योंकि बिहार में उसकी मौजूदगी पहले से ही कमजोर है.
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