Balirajgarh excavation Bihar: बिहार में जमीन के नीचे दबी एक प्राचीन कहानी अब फिर से सामने आ सकती है. दशकों से लगभग वीरान पड़े इस पुरातात्विक स्थल पर वैज्ञानिक उत्खनन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को आधिकारिक मंजूरी मिल गई है. इस फैसले से उम्मीद है कि हजारों साल पुरानी सभ्यता पर नया प्रकाश पड़ेगा और इतिहास के कई अनछुए पन्ने खुलेंगे. अगर उत्खनन में नए और महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलते हैं तो बिहार के ऐतिहासिक वैभव को नई पहचान मिल सकती है.
मिथिला के पुरातात्विक स्थल मधुबनी जिला स्थित बलिराजगढ़ में ASI की खुदाई को मंजूरी
बलिराजगढ़ उत्खनन को मिली हरी झंडी
बता दें कि संजय कुमार झा परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष भी हैं. संसदीय समिति के अध्यक्ष की हैसियत से वह बलिराजगढ़ के नीचे दबी हुई सभ्यता में गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं, ताकि समय के साथ एक बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल के तौर पर भी इसका विकास किया जा सके. उत्खनन के लिए चिन्हित क्षेत्र को स्वीकृत स्थल योजना (Site Plan) में लाल रंग से दर्शाया गया है. यह कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पटना परिपथ के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. हरि ओम शरण के निर्देशन में संपन्न कराया जाएगा.
2000 साल पुरानी सभ्यता पर नई रोशनी
मधुबनी जिले के बाबूबरही प्रखंड में स्थित बलिराजगढ़ एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल है, जिसे मिथिला के राजा बलि की राजधानी तथा प्राचीन मिथिला नगरी माना जाता है. लगभग 1 वर्ग किलोमीटर में फैले इस किलेबंदी वाले क्षेत्र में 1962 से 2014 के बीच हुई खुदाई में शुंग-कुषाण काल (लगभग 200 ईसा पूर्व) से लेकर पाल काल तक के महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं. लोकमान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार यह असुर राजा बलि की राजधानी थी, जो अपनी दानवीरता के लिए विख्यात थे. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस स्थल को वर्ष 1938 में संरक्षित स्मारक घोषित किया था. इसे लौह युग की विदेह जनजाति की राजधानी मिथिला से भी जोड़ा जाता है.
वैज्ञानिक उत्खनन से खुलेंगे प्राचीन राज
यहां पकी ईंटों से निर्मित विशाल सुरक्षात्मक दीवार के अवशेष मिले हैं जो लगभग 200 ईसा पूर्व से 12–13वीं शताब्दी तक के दीर्घकालीन बसाव को दर्शाते हैं. उत्खनन में उत्तर कृष्ण मार्जित मृदभांड (Northern Black Polished Ware), शुंग एवं कुषाणकालीन टेराकोटा मूर्तियां, तांबे के सिक्के, पत्थर के मनके तथा लोहे की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति का प्रमाण हैं. विशेष रूप से यहां पक्की नालियों के अवशेष भी मिले हैं जो लगभग 2000 वर्ष पूर्व के उन्नत शहरी नियोजन का संकेत देते हैं.
ASI को मिला खुदाई का अधिकार
उत्खनन के दौरान प्राप्त सभी प्राचीन वस्तुओं (Antiquities) की विस्तृत सूची संबंधित कार्यालय को उपलब्ध करानी होगी तथा समय-समय पर जारी नियमों एवं निर्देशों का कड़ाई से पालन अनिवार्य होगा. क्षेत्रीय कार्य पूर्ण होने के तीन माह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट महानिदेशक को प्रस्तुत की जाएगी. उत्खनन के प्रारंभ और समापन की सूचना भी औपचारिक रूप से दी जाएगी. यह स्वीकृति पत्र जारी होने की तिथि से एक वर्ष तक वैध रहेगा.
बिहार में जमीन के नीचे छिपा इतिहास
बलिराजगढ़ को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना भी बनाई जा रही है, जिससे क्षेत्र में सांस्कृतिक जागरूकता के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिल सकती है. यह पहल न केवल मिथिला की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि बिहार के ऐतिहासिक वैभव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में भी सहायक सिद्ध होगी. बता दें कि यह स्थल मधुबनी जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
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