Last Updated:
Palamu Holi Gaureya Baba Puja Tradition: झारखंड के पलामू में पीढ़ियों से गौरेया बाबा को घर का रक्षक मानकर पूजने की परंपरा है. होली की रात होने वाले इस रहस्यमयी अनुष्ठान में अब जीव बलि की जगह नारियल ने ले ली है. जानें घर के इस अदृश्य प्रहरी की पूरी कहानी.
पलामू: भारत के ग्रामीण अंचलों में लोक आस्था और परंपराओं के कई ऐसे रंग देखने को मिलते हैं. जो आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भले ही अलग हों, लेकिन जनमानस के विश्वास का अटूट हिस्सा हैं. झारखंड के पलामू जिले में होली के उल्लास के बीच एक ऐसी ही रहस्यमयी और प्राचीन परंपरा निभाई जाती है गौरेया बाबा की पूजा. यहां मान्यता है कि जब पूरी दुनिया होली के जश्न में डूबी होती है. तब गौरेया बाबा घर के मुख्य द्वार पर रक्षक बनकर तैनात होते हैं.
कौन हैं गौरेया बाबा? घर के अदृश्य प्रहरी
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार गौरेया बाबा को तामसी देवता के रूप में पूजा जाता है. उन्हें कुलदेवता से अलग माना जाता है. जहां कुलदेवता घर के भीतर पूजे जाते हैं. वहीं गौरेया बाबा का स्थान घर के मुख्य द्वार या बाहर होता है. ग्रामीण इन्हें घर का प्रहरी या चौकीदार मानते हैं. लोगों का दृढ़ विश्वास है कि गौरेया बाबा घर में किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति, भूत-प्रेत, शत्रुओं या तांत्रिक बाधाओं को प्रवेश करने से रोकते हैं.
होली की सुबह निमंत्रण, रात को अनुष्ठान
पलामू के लालगढ़ गांव सहित कई इलाकों में यह परंपरा आज भी जीवंत है. सेवानिवृत्त अंचल अधिकारी राजेंद्र कुमार झा बताते हैं कि इस विशेष पूजा की शुरुआत होली के दिन सुबह ही हो जाती है. सबसे पहले कच्चा दूध और गुड़ से छाक (अर्घ्य) दिया जाता है. दीप प्रज्वलित कर बाबा को निमंत्रण दिया जाता है. असली अनुष्ठान होली की रात को होता है. गांव के चौकीदार गाजे-बाजे के साथ घर-घर पहुंचते हैं. तंत्र-मंत्र व पारंपरिक विधि से बाबा की आराधना की जाती है.
आदि काल से आधुनिक बदलाव तक
गौरेया बाबा की पूजा का स्वरूप तामसी रहा है. इसलिए इसमें बलि का विशेष महत्व रहा है. प्राचीन काल से ही इस पूजा में 15 दिन के नवजात सूअर की बलि देने की प्रथा थी. धार्मिक ग्रंथों जैसे भगवत गीता के संदर्भों का उल्लेख करते हुए स्थानीय जानकार बताते हैं कि तामसी देवताओं को बलि या मांस का भोग अर्पण करने का विधान रहा है. बदलते समय के साथ समाज की सोच में भी बड़ा बदलाव आया है. अब कई परिवारों ने जीव-हत्या को त्याग दिया है. अब सूअर की बलि की जगह नारियल की बलि दी जाने लगी है. विधि-विधान वही रहते हैं. लेकिन अब इसे सात्विक रूप देने का प्रयास किया जा रहा है ताकि किसी जीव को हानि न पहुंचे.
भय और विश्वास का अनूठा संगम
इस परंपरा की जड़ें मानव सभ्यता के शुरुआती काल से जुड़ी मानी जाती हैं. राजेंद्र कुमार झा के अनुसार आदि काल में जब मनुष्य को बाहरी खतरों और प्राकृतिक आपदाओं का भय था. तब उसने अपनी रक्षा के लिए शक्तियों की पूजा शुरू की. गौरेया बाबा की पूजा दरअसल घर की सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक आध्यात्मिक तरीका है. जब हम सो रहे होते हैं या घर से बाहर होते हैं, तब बाबा हमारे द्वार की रक्षा करते हैं.
सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संदेश
पलामू की यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह वहां की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है. जहां एक तरफ होली रंगों और आपसी मेलजोल का त्योहार है. वहीं दूसरी ओर यह पूजा सामाजिक बदलाव की कहानी भी कहती है. बलि प्रथा का खत्म होना और उसकी जगह नारियल का उपयोग यह दर्शाता है कि परंपराएं जड़ नहीं होतीं, वे समय के साथ परिष्कृत होती हैं. आज भी पलामू के ग्रामीण इलाकों में होली की रात ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच जब गौरेया बाबा की जयकार होती है. तो लोगों के मन में एक सुरक्षा का भाव जागता है. यह आस्था, भय, विश्वास और आधुनिकता का एक ऐसा अनूठा संगम है, जो झारखंड की मिट्टी की महक को सहेजे हुए है.
About the Author
मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.