कभी ऐसा समय था जब गांव-गांव में मदारी भालू को साथ लेकर घूमते दिखाई देते थे. ढोलक की थाप और मदारी की आवाज पर भालू को नचाने का खेल बच्चों और ग्रामीणों के लिए बड़े मनोरंजन का साधन हुआ करता था. उसी दौर में एक अजीब सी मान्यता भी फैल गई थी कि अगर दुबले-पतले बच्चों पर भालू से फूंक मरवाई जाए तो वे जल्दी ही मोटे और तंदुरुस्त हो जाते हैं. इस बात में कितनी सच्चाई है वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने सारी जानकारी दी है.
जबकि वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने लोकल 18 को बताया कि इस मान्यता का वैज्ञानिक आधार नहीं है. यह केवल लोगों के बीच फैला एक भ्रम था, जिसे मदारी अपनी कमाई का साधन बना लेते थे. दरअसल, भालू से फूंक मरवाने के पीछे एक अलग ही सच्चाई छिपी हुई थी.
आस्था और अंधविश्वास के सहारे बनाते हैं पैसा
उन्होंने कहा कि मदारी भालू के मुंह पर ‘जाबी’ या लोहे का एक उपकरण लगा देते थे. इस कारण भालू अपना जबड़ा पूरी तरह खोल नहीं पाता था. ऐसे में वह केवल मुंह से हवा बाहर निकालता था, जिसे लोग ‘फूंक मारना’ समझ लेते थे. इसी को आधार बनाकर लोगों के बीच यह बात फैलाई जाती थी कि भालू की फूंक से बच्चे मोटे हो जाते हैं. ग्रामीणों की आस्था और अंधविश्वास का फायदा उठाकर मदारी इससे पैसा कमाते थे.
एस श्रीवास्तव ने कहा कि यह सब उस दौर की बात है जब जंगली जानवरों का उपयोग रोजी-रोटी के साधन के रूप में किया जाता था. लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. भारत सरकार और वन्य जीव संरक्षण कानूनों के तहत किसी भी जंगली जानवर का व्यावसायिक उपयोग करना प्रतिबंधित है. यही कारण है कि अब सर्कस या मदारी के खेल में जंगली जानवरों का इस्तेमाल लगभग समाप्त हो चुका है.
अंधविश्वास से रहे दूर
उन्होंने कहा कि भालू के बारे में यह भी माना जाता है कि यह अधिकतर ठंडे और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रहना पसंद करता है. गर्म इलाकों में इसे अधिक परेशानी होती है. ऐसे में पहले जब मदारी इन्हें मैदानी क्षेत्रों में लेकर घूमते थे, तो यह जानवरों के लिए भी काफी कष्टदायक स्थिति होती थी. उन्होंने आगे कहा कि बच्चों के मोटे या स्वस्थ होने का संबंध संतुलित आहार, पोषण और सही जीवन शैली से होता है, न कि किसी जानवर की फूंक से. इसलिए आज के समय में इस तरह की पुरानी मान्यताओं को अंधविश्वास मानते हुए उनसे दूर रहने की जरूरत है.
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