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Janjgir Champa News: स्थानीय भाषा में इसे डंगाही होली (Dangahi Holi 2026) कहा जाता है. इस दिन गांव की कुंवारी कन्याएं मंदिर में अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से ग्रामीणों को स्पर्श करती हैं. गांववालों की आस्था है कि इस छड़ी का आशीर्वाद मिलने से बीमारियां दूर होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है.
4 मार्च को देशभर में होली का त्योहार धूमधाम से मनाया गया. आज यानी 8 मार्च को रंग पंचमी मनाई जा रही है. जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर कोरबा रोड पर स्थित पंतोरा गांव में होली का त्योहार रंग और गुलाल के साथ मनाया जाता है लेकिन यहां की असली पहचान होली के पांचवें दिन खेली जाने वाली लट्ठमार होली है. राधारानी के गांव बरसाना की तर्ज पर पंतोरा में भी यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है. स्थानीय भाषा में इसे डंगाही होली कहा जाता है. इस दिन गांव की कुंवारी कन्याएं मंदिर में अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से लोगों को स्पर्श करती हैं. ग्रामीणों की आस्था है कि इस छड़ी का आशीर्वाद मिलने से बीमारियां दूर होती हैं और जीवन में खुशहाली आती है. यही कारण है कि इस पर्व का पंतोरा गांव में विशेष महत्व है और लोग इस परंपरा का सम्मान करते हुए पूरे उत्साह के साथ इसमें शामिल होते हैं.
वर्षों से चली आ रही परंपरा
लट्ठमार होली की इस परंपरा के बारे में स्थानीय निवासी राजेश्वर तिवारी लोकल 18 को बताते हैं कि बलौदा ब्लॉक के पंतोरा गांव में स्थित मां भवानी मंदिर परिसर में हर साल रंगपंचमी के दिन बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्रित होते हैं. यहां लट्ठमार होली की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है. उन्होंने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत रंगपंचमी के एक दिन पहले से ही हो जाती है. रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर ग्रामीण कोरबा जिले के मड़वारानी के जंगल से विशेष बांस की छड़ी लेकर आते हैं. इस छड़ी को चुनने की भी एक खास परंपरा है. जिस बांस की छड़ी को एक ही कुल्हाड़ी के वार में काटा जाता है, उसी छड़ी को इस पर्व के लिए चुना जाता है. उसके बाद उस बांस की छड़ी की विधि-विधान से पूजा की जाती है.
मंदिर में छड़ी की पूजा-अर्चना
उन्होंने कहा कि रंगपंचमी के दिन मां भवानी मंदिर में उस छड़ी की पूजा-अर्चना की जाती है और यह कामना की जाती है कि गांव में किसी प्रकार की बीमारी न फैले और सभी ग्रामीण सुखी और स्वस्थ रहें. मंदिर में माता की पूजा के बाद कुंवारी कन्याओं द्वारा उस अभिमंत्रित बांस की छड़ी को पांच बार मां भवानी को स्पर्श कराया जाता है. इसके बाद मंदिर परिसर में विराजमान अन्य देवी-देवताओं को भी उसी छड़ी से स्पर्श कराया जाता है. इसके बाद यह छड़ी कुंवारी कन्याओं को दी जाती है.
कुंवारी कन्याओं को सौंप दी जाती है छड़ी
उन्होंने आगे बताया कि मंदिर की पूजा के बाद गांव के बैगा (पंडित) द्वारा छड़ी कुंवारी कन्याओं को सौंप दी जाती है. इसके बाद कन्याएं मंदिर परिसर के बाहर खड़े ग्रामीणों को उस छड़ी से मारती (सांकेतिक स्पर्श) हैं. यहां की सबसे खास बात यह है कि इस छड़ी का स्पर्श पाने के लिए लोग खुद आगे आते हैं. यहां तक कि रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी इस परंपरा में शामिल होने के लिए रुक जाते हैं और छड़ी का स्पर्श पाते हैं. इसे कोई भी बुरा नहीं मानता बल्कि इसे आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया जाता है.
मंदिर परिसर में उत्सव का माहौल
उन्होंने कहा कि इस दौरान मंदिर परिसर में रंग-गुलाल के साथ उत्सव का माहौल बन जाता है. ग्रामीण एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और पूरे गांव में खुशियों का माहौल दिखाई देता है. ग्रामीणों का मानना है कि जब से यह परंपरा शुरू हुई है, तब से गांव में किसी प्रकार की गंभीर बीमारी नहीं फैली है, इसलिए यह परंपरा केवल एक त्योहार नहीं बल्कि गांव की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुकी है. पंतोरा गांव के लोग इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक पहचान मानते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इसे संजोकर आगे बढ़ा रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह इस अनोखी परंपरा को निभाती रहेंगी और मां भवानी की कृपा पूरे गांव पर बनी रहेगी.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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