बेसक आप दिल्ली में रह रहे हो, लेकिन संभव है कि लुटियन दिल्ली तक आपके पहुंचने से पहले मेरठ निवासी पहुंच जाएं। खासतौर पर उस स्थिति में जब आप नरेला, कापसहेड़ा, बवाना, नागलोई जैसे क्षेत्रों में रह रहे हों। यहां से नई दिल्ली पहुंचने में हर दिन करीब दो घंटे लगते हैं, जबकि अब नमो भारत से मेरठ से दिल्ली के सराय काले खां पहुंचने में 55 मिनट लगेंगे।
राजधानी की परिवहन नीति में बीते वर्षों में रीजनल कनेक्टिविटी को स्पष्ट प्राथमिकता मिली है, जबकि शहर के भीतर की कनेक्टिविटी पीछे छूटती नजर आती है। एनसीआर को जोड़ने वाली तेज रफ्तार ट्रेनें चल रही हैं, नए कॉरिडोर बन रहे हैं और घंटों का सफर मिनटों में सिमट रहा है, लेकिन दिल्ली के भीतर की तस्वीर अलग है। यहां कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां लाखों लोग रहते हैं, फिर भी उनका रोज का आवागमन किसी जंग से कम नहीं।
दरअसल, दिल्ली की परिवहन नीति पिछले कुछ वर्षों में रीजनल कनेक्टिविटी पर अधिक केंद्रित दिखती है। मेरठ, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम जैसे शहरों को तेज रफ्तार से जोड़ने की दिशा में बड़े निवेश हुए।
नमो भारत के साथ ही दिल्ली मेट्रो का संपर्क एनसीआर में तेजी से बढ़ा है, इससे एनसीआर के यात्रियों को लाभ मिल रहा है। अब सवाल यह है कि क्या राजधानी के भीतर समान प्राथमिकता दी जा रही है। दिल्ली की सड़कें पहले ही क्षमता से अधिक वाहनों का दबाव झेल रही हैं। ट्रैफिक जाम में फंसे रहने का औसत समय कई इलाकों में प्रतिदिन 60–90 मिनट तक पहुंच जाता है।
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