नैनीताल में इन दिनों तिब्बती नववर्ष ‘लोसर’ की धूम है. तिब्बती पंचांग के अनुसार 2153वें वर्ष की शुरुआत के साथ ही पूरा समुदाय उत्सव के रंग में रंगा नजर आ रहा है. ‘फायर हॉर्स किंग ईयर’ के रूप में शुरू हुए इस नए साल पर सुख निवास स्थित बौद्ध मठ में विशेष प्रार्थनाएं और ध्वज परिवर्तन के अनुष्ठान किए जा रहे हैं. श्रद्धा और परंपरा के इस मेल के बीच शहर की प्रसिद्ध तिब्बती मार्केट भी तीन दिनों के लिए बंद रखी गई है ताकि हर कोई इस पावन पर्व का हिस्सा बन सके. जानिए क्या है लोसर का महत्व और क्यों इस बार का ‘अग्नि अश्व’ वर्ष खास माना जा रहा है.
तिब्बती मार्केट के अध्यक्ष यशी थुप्तेन ने बताया कि लोसर तिब्बती समाज का नया साल है, जिसकी शुरुआत प्रार्थना, शुद्धिकरण और शुभ संकल्पों के साथ की जाती है. तिब्बत में यह पर्व लगभग 15 दिनों तक चलता है, जबकि भारत में प्रायः तीन दिनों तक ही मनाया जाता है. नैनीताल में रहने वाला तिब्बती समुदाय भी अपनी परंपराओं को सहेजते हुए हर वर्ष इसे पूरे उत्साह से मनाता है.
खास तरह से मनाया जाता है लोसर
लोसर की शुरुआत बौद्ध मठ परिसर में पारंपरिक ध्वज परिवर्तन (प्रेयर फ्लैग चेंज) से होती है. बौद्ध परंपरा में रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज शुभ ऊर्जा और सकारात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं. मान्यता है कि इन पर अंकित मंत्र हवा के साथ चारों दिशाओं में फैलते हैं और शांति तथा कल्याण का संदेश देते हैं. पुराने ध्वजों को हटाकर नए ध्वज लगाने की परंपरा को नकारात्मकता के अंत और नए वर्ष की मंगल शुरुआत के रूप में देखा जाता है. पर्व के दौरान सुबह भिक्षुओं द्वारा विधि-विधान से पूजा, मंत्रोच्चार और शांति पाठ किया जाता है. प्रार्थना सभा में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ दूर-दराज क्षेत्रों से आए अनुयायी भी भाग लेते हैं. दीप प्रज्वलन और पारंपरिक धार्मिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि से मठ परिसर आध्यात्मिक वातावरण में डूब जाता है. श्रद्धालु विश्व शांति, परिवार की खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हैं.
इस बार फायर हॉर्स किंग ईयर
यशी थुप्तेन ने बताया कि तिब्बती ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार 12 पशु राशियों चूहा, बैल, बाघ, खरगोश, ड्रैगन, सांप, घोड़ा, भेड़, बंदर, पक्षी, कुत्ता और सुअर का चक्र चलता है और इस बार वर्ष फायर हॉर्स किंग ईयर के रूप में आरंभ हुआ है. अग्नि तत्व और घोड़े का प्रतीक ऊर्जा, साहस, गति और सकारात्मक बदलाव का संकेत माना जाता है. उन्होंने कहा कि समुदाय इस वर्ष को नई उम्मीदों और प्रगति के वर्ष के रूप में देख रहा है.
लोसर केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल का भी अवसर है. इस दौरान तिब्बती और भोटिया समुदाय के लोग पारंपरिक परिधानों में सजकर एक-दूसरे को “ताशी देलेक” कहकर नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं. घरों और पूजा स्थलों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, रिश्तेदारों के घर जाकर बधाइयां दी जाती हैं और कई घरों में सामूहिक भोज का आयोजन होता है. लोग बीते वर्ष की भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए आने वाले वर्ष के सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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