स्थानीय लोगों के अनुसार, अंग्रेजों के दौर में नैनीताल और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्ट्रॉबेरी की खेती बड़े पैमाने पर होती थी. शहर के नजदीकी इलाकों जैसे ज्योलीकोट के गॉंजा गांव से लेकर भवाली तक करीब 50 से 55 किसान स्ट्रॉबेरी की खेती करते थे. उस समय व्यापारी गांवों में बड़ी-बड़ी बांस की टोकरियां लेकर स्ट्रॉबेरी खरीदने पहुंचते थे और यह फल देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता था.
स्ट्रॉबेरी उत्पादन से जुड़े काश्तकार प्रताप सिंह जीना बताते हैं कि उनके गांव में अंग्रेजों के समय से ही इस फसल की खेती होती आ रही थी. उस दौर में यहां की स्ट्रॉबेरी आकार में भले ही छोटी होती थी, लेकिन उसका स्वाद बेहद मीठा और खुशबूदार होता था. नैनीताल की स्ट्रॉबेरी से बनने वाला जैम भी काफी प्रसिद्ध था और इसकी मांग बड़े शहरों के होटलों तक रहती थी. उन्होंने बताया कि खासतौर पर दिल्ली के कई बड़े होटलों में नैनीताल की स्ट्रॉबेरी की मांग रहती थी. व्यापारी सीधे गांवों में आकर किसानों से स्ट्रॉबेरी खरीदते थे. इससे किसानों को अच्छी आमदनी भी हो जाती थी और यह फसल क्षेत्र की पहचान बन गई थी.
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इस वजह से गिर गया उत्पादन
हालांकि समय के साथ-साथ हालात बदलने लगे. धीरे-धीरे किसानों ने स्थानीय किस्मों की जगह हाइब्रिड स्ट्रॉबेरी उगाना शुरू कर दिया. शुरुआत में इसका उत्पादन ठीक रहा, लेकिन कुछ वर्षों बाद यह भी कम होने लगा. प्रताप सिंह जीना के अनुसार, एक समय में यहां हर सीजन में करीब 9 से 10 हजार किलो स्ट्रॉबेरी का उत्पादन होता था, जो अब घटकर महज 10 से 20 किलो तक रह गया है.उन्होंने बताया कि अब कई बड़े व्यापारी स्थानीय स्ट्रॉबेरी की बजाय उत्तर प्रदेश से स्ट्रॉबेरी खरीदकर यहां बेच रहे हैं.
खासतौर पर संभल जिले से हाइब्रिड स्ट्रॉबेरी मंगाई जा रही है, जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाती है. स्ट्रॉबेरी पैदावार की इस गिरावट के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. स्थानीय किसानों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा. अनियमित बारिश, बढ़ता तापमान और बदलती जलवायु के कारण स्ट्रॉबेरी की खेती प्रभावित हो रही है. इसके अलावा बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ना और इस फसल को लेकर सरकारी स्तर पर पर्याप्त प्रोत्साहन न मिलना भी उत्पादन घटने की बड़ी वजह मानी जा रही है.
ग्लोबल वार्मिंग है वजह
नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित तिवारी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का असर पहाड़ी खेती पर साफ दिखाई देने लगा है. पहले ठंडा और संतुलित मौसम स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए अनुकूल माना जाता था, लेकिन अब तापमान बढ़ने और मौसम के असंतुलन के कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा है. प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के कई किसानों ने हाइब्रिड स्ट्रॉबेरी की खेती में अच्छी सफलता हासिल की है. वैज्ञानिकों ने वहां की जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखते हुए ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो गर्मी को भी सहन कर सकती हैं. इन हाइब्रिड स्ट्रॉबेरी का आकार बड़ा होता है और बाजार में इनकी मांग भी अच्छी है. हालांकि उत्तराखंड के कुछ इलाकों में भी अब हाइब्रिड स्ट्रॉबेरी की कुछ प्रजातियां उगाई जा रही हैं. इनमें ‘चांसलर’ जैसी किस्में शामिल हैं, जो आकार में बड़ी और स्वाद में मीठी मानी जाती हैं.
स्ट्रॉबेरी विटामिन-सी का अच्छा स्रोत होती है और इसका उपयोग खाने के साथ-साथ आइसक्रीम व अन्य उत्पादों में फ्लेवर के रूप में भी किया जाता है. उनका मानना है कि यदि पहाड़ी क्षेत्रों में आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाया जाए, तो इस पारंपरिक फसल को बचाया जा सकता है. ग्रीनहाउस खेती, जैविक खाद और वैज्ञानिक तरीकों के इस्तेमाल से स्ट्रॉबेरी उत्पादन को फिर से बढ़ाया जा सकता है. फिलहाल बाजार में हाइब्रिड स्ट्रॉबेरी ने अपनी जगह बना ली है, लेकिन नैनीताल की पारंपरिक पहाड़ी स्ट्रॉबेरी की अनूठी मिठास और खुशबू आज भी लोगों को याद है.
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