Human Wildlife Conflict Uttarakhand: उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में घटती बर्फबारी और बदलते मौसम का सीधा असर भालुओं की शीतनिद्रा और प्राकृतिक जीवनशैली पर पड़ा है. समय से पहले जागने वाले भालू अब गांवों और आबादी वाले इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव वन्यजीव संघर्ष बढ़ गया है. वन्यजीव विशेषज्ञों ने बताया आखिर इसका मुख्य कारण क्या है.
विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में भालू नवंबर से फरवरी या मार्च तक लगभग 120 दिनों की शीतनिद्रा में रहते हैं. लेकिन बीते कुछ सालों में तापमान में लगातार बढ़ोतरी और बर्फबारी में भारी कमी के कारण यह अवधि घटकर महज 50 से 60 दिनों तक सीमित रह गई है. समय से पहले जागने के बाद जंगलों में उन्हें पर्याप्त प्राकृतिक भोजन नहीं मिल पाता. मजबूरन भालू भोजन की तलाश में गांवों, कस्बों और आबादी वाले इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं.
इस बदलते व्यवहार का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है. कूड़े के ढेर, खेत, फलदार पेड़ और घरों के आसपास के इलाके भालुओं के नए ठिकाने बनते जा रहे हैं. इससे न केवल फसलों को नुकसान हो रहा है, बल्कि भालू हमलों की घटनाओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है. कई क्षेत्रों में ग्रामीणों में डर का माहौल है और वन विभाग के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. मशहूर पर्यावरणविद् डॉ. अजय रावत का कहना है कि भालू और इंसान के बीच बढ़ते संघर्ष की जड़ में जंगलों का लगातार दोहन है. जंगलों के कटाव से तापमान में बदलाव आ रहा है और इसका सीधा असर भालुओं के हाइबरनेशन चक्र पर पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि शीतनिद्रा पूरी न हो पाने के कारण भालू अधिक आक्रामक और चिड़चिड़े हो गए हैं, जिससे हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं.
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भालू का नष्ट हो रहा भोजन
डॉ. रावत के अनुसार भालुओं का प्रमुख प्राकृतिक भोजन बांज (ओक) के बीज होते हैं, लेकिन बांज के पेड़ों का उत्पादन लगातार घट रहा है. इसका एक बड़ा कारण इन वृक्षों का अवैध कटान है. जबकि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बांज के पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध है, इसके बावजूद इनका दोहन जारी है. इससे भालुओं का मुख्य भोजन नष्ट हो रहा है और वे आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं. इसके अलावा जंगलों के भीतर और आसपास तेजी से बन रहे रिजॉर्ट्स भी समस्या को बढ़ा रहे हैं. तेज आवाज में बजता संगीत, रोशनी और बढ़ती मानवीय गतिविधियां भालुओं को तनावग्रस्त बना रही हैं. भालुओं के पारंपरिक मूवमेंट कॉरिडोर, जिनसे वे एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में सुरक्षित आवाजाही करते थे, अब खत्म होते जा रहे हैं. इससे उनकी प्राकृतिक गतिविधियों में बाधा आ रही है और टकराव की आशंका बढ़ रही है.
बर्फबारी ना होने की वजह से बढ़ रही घटनाएं
वन्यजीव प्रेमी संजय छिम्वाल का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भालुओं के हाइबरनेशन में बदलाव का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है. पहले जब तीन महीने तक भारी बर्फबारी होती थी, तब भालू शीतनिद्रा में चले जाते थे. अब बर्फबारी न के बराबर हो रही है, जिससे भालू भोजन की तलाश में निचले और आबादी वाले इलाकों में पहुंच रहे हैं. उन्होंने बताया दिया कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मजबूत सूचना तंत्र विकसित करना होगा, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बढ़ानी होगी और ग्रामीणों को भी जागरूक करना जरूरी है.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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