सीहोर के हाउसिंग बोर्ड रेलवे ओवर ब्रिज पर निर्माण कार्य पहले ही धीमी गति और लापरवाही के आरोप झेल रहा था, लेकिन अब इसके सामने एक और बड़ा अवरोध खड़ा हो गया है। ब्रिज के अंतिम छोर पर एक निजी जमीन स्वामी ने हाल ही में पक्की दीवार खड़ी कर दी है, जो सीधा ब्रिज के रास्ते पर आ रही है। इससे निर्माण कार्य आगे बढ़ ही नहीं पा रहा है। सवाल यह है कि क्या 28 करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट में निजी जमीन होने की जानकारी डीपीआर में ही नहीं थी या फिर इसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?
पूर्व पार्षद का तीखा आरोप, लापरवाही की हद पार
पूर्व पार्षद मनोज गुजराती ने सोशल मीडिया पर आग उगलते हुए कहा कि ब्रिज कॉर्पोरेशन ने लापरवाही की सारी हदें पार कर दी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट में पूछा गया कि क्या डीपीआर बनाते समय अधिकारियों ने आगे निजी भूमि होने की जानकारी छिपाई? क्या राजस्व विभाग से सीमांकन कराया गया था? उन्होंने बताया कि ब्रिज का छोर पूरी तरह बन चुका, लेकिन अब उसके बिल्कुल सामने खड़ी दीवार ने रास्ता और संकरा कर दिया है। उन्होंने इसे करोड़ों की सार्वजनिक राशि और जनता के समय से खिलवाड़ बताया।
सर्विस रोड के बिना पहले ही फंसा प्रोजेक्ट
यह नया विवाद ऐसे समय सामने आया है जब हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के सैकड़ों निवासी सर्विस रोड की मांग को लेकर महीनों से विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि स्वीकृत 2.76 करोड़ के बावजूद 1700 मीटर सर्विस रोड का निर्माण जानबूझकर रोका जा रहा है। विरोध की आवाज़ अब तक धरना, काले झंडे, सांप-सीढ़ी प्रतियोगिता और आमरण अनशन तक पहुंच चुकी है। ऐसे में निजी दीवार खड़े होने का मामला लोगों के आक्रोश को और बढ़ा रहा है।
सीमांकन में उजागर हुई तमाम गड़बड़ियां
सूत्रों के अनुसार सीमांकन में सामने आया है कि रोड का लगभग आधा हिस्सा निजी भूमि के अंदर आता है। यानी तकनीकी भाषा में कहें तो आरओबी की उतार को लेकर जमीन स्पष्ट ही नहीं थी। विशेषज्ञों के अनुसार इतने बड़े प्रोजेक्ट में बिना जमीन स्पष्ट किए निर्माण कराना प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आता है। यह संदेह भी जताया जा रहा है कि शुरुआती चरण में समस्या जानते हुए भी निर्माण आगे बढ़ाया गया ताकि बाद में अधिग्रहण के नाम पर करोड़ों का खेल संभव हो सके।
ब्रिज कॉर्पोरेशन ने माना तथ्य,अब कर रहा नुकसान नियंत्रण
ब्रिज कॉर्पोरेशन भोपाल के इंजीनियर केसी वर्मा ने स्वीकार किया कि दीवार की जानकारी उन्हें मिली है और सीमांकन में निजी भूमि निकलने की बात सही है। उन्होंने बताया कि कलेक्ट्रेट व राजस्व विभाग में फाइल भेज दी गई है और अधिग्रहण व मुआवजा प्रक्रिया की औपचारिकता आगे बढ़ेगी। लेकिन लोगों का सवाल है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में यह बात अब क्यों पता चल रही है? शुरुआत में क्यों नहीं?
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‘जब तक अधिग्रहण पूरा नहीं होता, ब्रिज का काम आगे बढ़ना मुश्किल’
जनता में अब चर्चा है कि दीवार खड़े होने से प्रोजेक्ट का रुकना सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि भ्रष्ट तकनीक और फाइलों के खेल का नतीजा हो सकता है। 28 करोड़ के ब्रिज का भविष्य अब कागज़ी प्रक्रियाओं और नोटिस-मुआवजा-सुनवाई की लंबी सरकारी यात्रा पर टिका है। जब तक अधिग्रहण पूरा नहीं होता, ब्रिज का काम आगे बढ़ना मुश्किल है कि यानी जनता को ट्रैफिक जाम, डाइवर्जन और परेशानी झेलते रहना होगा।
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