सतना में तेजी से बढ़ रही मूंग की खेती
पेस्टीसाइड एक्सपर्ट अमित सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि सतना जिले में मूंग और उड़द की खेती काफी अच्छी होती है. उन्होंने कहा कि मार्च से लेकर 10 अप्रैल तक मूंग की बुवाई करना सबसे बेहतर माना जाता है. इस दौरान तापमान और मौसम फसल के लिए अनुकूल रहते हैं जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है.
उन्होंने बताया कि मूंग और उड़द की खेती में एक एकड़ जमीन के लिए लगभग 7 से 8 किलो बीज की आवश्यकता होती है. पूरी फसल चक्र में बहुत ज्यादा कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि दो बार छिड़काव करना ही पर्याप्त होता है. यदि किसान सही समय पर खेती की तकनीकों का पालन करें तो प्रति एकड़ 5 से 8 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.
कीट नियंत्रण के लिए सही समय पर करें छिड़काव
मूंग और उड़द की फसल में शुरुआती दिनों में पत्ती काटने वाले कीड़ों और रस चूसने वाले कीटों का खतरा रहता है. इससे बचाव के लिए बुवाई के लगभग 10 से 15 दिन बाद कॉन्टैक्ट पॉयजन का इस्तेमाल करना चाहिए. इस दौरान क्लोरोपायरीफॉस और साइपरमेथ्रिन के मिक्सचर का उपयोग प्रभावी माना जाता है.
विशेषज्ञों के अनुसार प्रति एकड़ 300 से 400 मिलीलीटर दवा को 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए. यह शुरुआती कीटों और इल्लियों को नियंत्रित करने में मदद करता है. साथ ही छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के समय करना चाहिए जब धूप कम हो, ताकि दवा का असर अधिक समय तक बना रहे.
फूल आने के समय रखें विशेष सावधानी
फसल में दूसरा छिड़काव फूल आने की अवस्था में करना जरूरी होता है. आमतौर पर मूंग और उड़द की फसल में बुवाई के 30 से 40 दिन बाद फूल आने लगते हैं और यही समय सबसे संवेदनशील माना जाता है. इस समय थ्रिप्स जैसे कीट फूलों के अंदर छिपकर नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि इल्लियां बाहर से पौधों पर हमला करती हैं.
इसलिए इस अवस्था में सिस्टमिक और कॉन्टैक्ट दोनों प्रकार के कीटनाशकों का मिश्रण इस्तेमाल करना चाहिए. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि फूल आने के समय छिड़काव हमेशा शाम चार बजे के बाद किया जाए क्योंकि दिन में छिड़काव करने से मधुमक्खियों को नुकसान हो सकता है और इससे परागण कम होने के कारण फलियां भी कम बनती हैं.
खाद और पोषण प्रबंधन भी है जरूरी
मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों में जड़ों के विकास और अच्छी पैदावार के लिए फास्फोरस की पर्याप्त मात्रा बेहद जरूरी होती है. इसके लिए किसान डीएपी खाद का उपयोग कर सकते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार प्रति एकड़ लगभग 40 से 50 किलोग्राम डीएपी का प्रयोग करना फसल के लिए लाभदायक होता है.
हालांकि खाद को बीज के साथ मिलाकर नहीं डालना चाहिए बल्कि बीज से 2 से 3 इंच नीचे या बगल में डालना बेहतर रहता है. यदि बुवाई के समय खाद नहीं डाल पाए हों तो पहली सिंचाई के समय भी इसका उपयोग किया जा सकता है. वहीं फूल आने के समय यदि फास्फोरस की कमी दिखाई दे तो 00:52:34 एनपीके खाद का एक किलो प्रति एकड़ की दर से स्प्रे किया जा सकता है जिससे पौधों को जल्दी पोषण मिलता है.
इन क्षेत्रों में अधिक होती है खेती
उन्होंने बताया कि सतना जिले के जिन क्षेत्रों में पर्याप्त पानी उपलब्ध है वहां मूंग और उड़द की खेती अधिक की जाती है. मैहर और रामपुर जैसे इलाकों में किसान जायद सीजन में बड़ी मात्रा में इन दलहनी फसलों की खेती करते हैं. सही तकनीक और समय पर प्रबंधन अपनाकर किसान कम लागत में अच्छी कमाई कर सकते हैं.
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