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कृषि न्यूजः यदि खाद और सिंचाई के बाद भी पौधों की बढ़वार नहीं हो रही है, तो किसान साफ नामक दवा या इंडोफिल-45 का उपयोग कर सकते है. इसके लिए 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. यह फफूंद जनित रोगों को नियंत्रित करने में मदद करता है और पौधों की सेहत सुधारता है.
डॉ. कुमार ने कहा कि देर से बोए गए गेहूं की फसल पर बदलते मौसम का बुरा प्रभाव पड़ता है. जिसमें रस्ट रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ सकता है. यह रोग ठंडे आर्द्र और कोहरे वाले मौसम में अधिक फैलता है. अगर खेत में नमी अधिक हो और तापमान 10 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहे तो संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है. इसके बीजाणु हवा के माध्यम से एक खेत से दूसरे खेत तक पहुंच जाते है. शुरुआत में पत्तियों पर पीले या भूरे धब्बे बनते है जो बाद में सूखने लगते है. प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित होने से दाना कमजोर हो जाता है और उत्पादन में 30 से 50 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है.
बचाव के लिए किसानों को रोगरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए और संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए. नाइट्रोजन की अधिक मात्रा से बचें, क्योंकि इससे रोग का प्रकोप बढ़ सकता है. प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही प्रोपिकोनाजोल या टेबुकोनाजोल जैसे फफूंदनाशी का छिड़काव करें और खेत में जलभराव न होने दें.
यदि खाद और सिंचाई के बाद भी पौधों की बढ़वार नहीं हो रही है, तो किसान साफ नामक दवा या इंडोफिल-45 का उपयोग कर सकते है. इसके लिए 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. यह फफूंद जनित रोगों को नियंत्रित करने में मदद करता है और पौधों की सेहत सुधारता है.
डॉ. कुमार ने आगे कहा कि देर से बोए गए गेहूं को अधिक निगरानी और समय पर उपचार की जरूरत होती है. समय पर सही उपाय अपनाकर किसान अपनी फसल को नुकसान से बचा सकते है और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते है.
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