CBI की सख्त दलील
सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि यह पोस्ट कन्विक्शन बेल का मामला है और बिना किसी बदले हुए हालात के सजा निलंबित करना कानून के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि सभी आरोपी अवैध तरीके से बाहर हैं. सजा निलंबन गैरकानूनी है.
कपिल सिब्बल का पलटवार
लालू यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सीबीआई की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए कोर्ट से संयम बरतने की अपील की. सिब्बल ने कहा कि मामले में कई सह-आरोपी हैं, जिनमें से कुछ ने अब तक जवाब भी दाखिल नहीं किया है. उन्होंने कहा कि इतनी उत्तेजना की कोई जरूरत नहीं है. सभी पक्षों को सुने बिना फैसला नहीं हो सकता.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बेंच ने कहा कि हम सब जानते हैं कि यह याचिका किस बारे में है और इसका परिणाम क्या हो सकता है. आप अपना काम करें, हम अपना काम करेंगे. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि देवघर चारा घोटाले के ज़्यादातर आरोपी अब वरिष्ठ नागरिक हैं कुछ 60, 70 और यहां तक कि 80 साल से भी ज्यादा उम्र के हैं. इसी आधार पर कोर्ट ने संकेत दिया कि वर्षों से लंबित मामलों को अब बंद किया जाना चाहिए.
सुनवाई अप्रैल तक टली
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के मेरिट्स में जाए बिना सुनवाई अप्रैल तक के लिए टाल दी. साथ ही निर्देश दिया कि जिन मामलों में आरोपी की मृत्यु हो चुकी है, उन्हें औपचारिक रूप से बंद किया जाए.
क्या था मामला?
देवघर ट्रेजरी केस, बहुचर्चित चारा घोटाले का हिस्सा है. लालू यादव पर आरोप है कि 1990 से 1994 के बीच पशुपालन विभाग के प्रभारी रहते हुए उन्होंने देवघर कोषागार से करीब ₹89.27 लाख की अवैध निकासी करवाई. साल 2017 में विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी. बाद में झारखंड हाई कोर्ट ने सज़ा निलंबित कर जमानत दी, जिसे अब सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
क्या यह लालू के लिए राहत के संकेत?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां खासतौर पर आरोपियों की उम्र और लंबे समय से लंबित मामलों को बंद करने पर जोर को लालू यादव के लिए आंशिक राहत के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, अंतिम फैसला अब अप्रैल में होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगा.
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