इस दौरान होलाष्टको में इस होली के त्यौहार में रंग खेलने की शुरुआत हो जाती है. होलाष्टको के दौरान वैरागी समुदाय की टोली अपने गुरु की तपोस्थली में होली खेलने पहुंचते है. ऐसे में वैरागी समुदाय के द्वारा आज झिड़ी स्थित मंदिर से इस होली की शुरुआत को गई.
होलाष्टको में गुरु की तपोस्थली पर होली खेलने पहुंचे वैरागी
वैरागी समुदाय के अध्यक्ष एकादशी महंत ने बताया कि वैरागी समुदाय की होली की होली बसंत के दिन बसंत के गीत गाने से शुरू हो जाती है. ऐसे में 40 दिनों तक यहां होली के गीत गाने का सिलसिला रहता है. साथ ही इस दौरान महंत समुदाय के द्वारा होली संध्याओं का भी आयोजन होता है.
उन्होंने बताया कि होलाष्टको में इस दौरान वैरागी समुदाय के लोगों के द्वारा होलाष्टको के दिन अपने गुरु फौरी महाराज की तपोस्थली झिड़ी में होली खेलने आते हैं. ऐसे में आज होलाष्टकों का छठा दिन है, जब महंत समुदाय के लोग झिड़ी में होली के गीत गाने पहुंचते है. उन्होंने बताया कि भगवान रघुनाथ के कुल्लू आने के साथ ही वैरागी समुदाय कुल्लू आया था. ऐसे में इस होली की परंपरा का कुल्लू में निर्वहन किया जाता आ रहा है.
पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ गाए जाते हैं होली के गीत
वैरागी समुदाय से संबंध रखने वाले श्याम सुंदर मंहत ने बताया कि वैरागी समुदाय द्वारा इस होली की परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है. वैरागी समुदाय के लोग पारंपरिक व्रज और अवध भाषा के होली गीतों को गाने का काम करते है. उन्होंने बताया कि इस पारंपरिक होली को झांझ और दफ के साथ ही गाया जाता है.
यहां होली में आसपास में एक दूसरे को रंग लगाकर होली खेली जाती है. यहां न ही कोई हुड़दंग होता है और ना ही कोई होली पार्टी, सिर्फ पारंपरिक गीत और परंपराओं का निर्वहन करके होली खेला जाता है. उन्होंने बताया कि वैरागी समुदाय की होली में छोटे बच्चे बड़ों के पैरों में गुलाल लगाते हैं. जबकि बड़े बुजुर्ग बच्चों के कंधों और सिर पर गुलाल डालकर होली खेलते हैं.
77 साल में पहली बार देखी वैरागियों की होली
कुल्लू के रहने वाले राजिंदर ने बताया कि वह पहली बार ही वैरागी समुदाय के साथ होली खेलने ठावा मंदिर पहुंचे हैं. उन्होंने बताया कि कुल्लू के बाकी जगहों में खेली जाने वाली होली से काफी अलग वैरागियों की होली खेली जाती है. ऐसे में उन्हें यहां की होली बेहद अच्छी लगी. उन्होंने बताया कि यहां आज भी अपनी परंपराओं को निभाया जा रहा है.
धर्मेंद्र ने बताया कि कुल्लू में वैरागी समुदाय का होली गायन बेहद खास रहता है. ऐसे में उन्हें भी हर साल इस पारंपरिक होली का हिस्सा बनना और पारंपरिक गीत गाने में आनंद आता है. यहां ब्रज और अवध के गीत गए जाते हैं.
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