पार्वती घाटी के कसोल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड पर जोखिम न्यूनीकरण एवं आपदा तैयारी विषय पर शुक्रवार को एक दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों पर चिंता जताई। अतिरिक्त सचिव (राजस्व) आपदा प्रबंधन एवं प्रोग्राम निदेशक निशांत ठाकुर ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियर झीलों की संख्या और आकार बढ़ रहा है। ऐसे संभावित खतरों से निपटने के लिए वैज्ञानिक निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि संवेदनशील क्षेत्रों में गांव और पंचायत स्तर पर छोटे-छोटे समूह गठित किए जाएं।
ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली हिमनदीय झीलें भविष्य में गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। जिले की मणिकर्ण घाटी के सोसण क्षेत्र में स्थित वासुकी झील समुद्र तल से लगभग 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक संवेदनशील हिमनदीय झील है। झील के संभावित खतरे को देखते हुए यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसके फटने की स्थिति में पार्वती नदी में अचानक बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। अधिशासी अभियंता अनिल कुमार जसवाल, वैज्ञानिक डॉ. भानु प्रताप, डॉ. एस एस रंधावा, डॉ. रितेश कुमार और राकेश कुमार आपदा तैयारी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जानकारी दी।
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