375 साल पुराना मंदिर, गहरी आस्था की जड़ें
यह मंदिर खरगोन के सबसे पुराने मंदिरों में गिना जाता है. मान्यता है कि इसकी स्थापना करीब 375 साल पहले, सन 1651 में मल्लिवाल परिवार द्वारा की गई थी. मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और चमत्कार इसे बाकी शिव मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाते हैं. महाशिवरात्रि पर यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अलसुबह से देर रात तक पूजन-अर्चन का सिलसिला चलता रहता है.
तड़के 3 बजे खुलते हैं पट, ब्रह्म मुहूर्त में विशेष आरती
मंदिर समिति अध्यक्ष मनोज भावसार बताते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के पट तड़के 3 बजे खोल दिए जाते हैं. ब्रह्म मुहूर्त में बाबा सिद्धनाथ महादेव की विशेष श्रृंगार आरती होती है. इसके बाद सुबह से लेकर शाम तक अभिषेक और पूजन चलता रहता है. श्रद्धालु बाबा से शहर की सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं.
दूल्हा बनते हैं बाबा, रात में होती है महाआरती
शाम के समय बाबा का विशेष श्रृंगार किया जाता है. उन्हें साफा पहनाकर दूल्हा रूप में सजाया जाता है. रात करीब 8:30 बजे महाआरती होती है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं. इसके बाद साबूदाना खिचड़ी का प्रसाद वितरित किया जाता है, जो वर्षों पुरानी परंपरा है.
साल में एक बार शयन दर्शन का दुर्लभ सौभाग्य
महाशिवरात्रि की रात ठीक 12 बजे भक्तों को बाबा सिद्धनाथ महादेव के शयन दर्शन कराए जाते हैं. इस दौरान भगवान को शयन अवस्था में विराजमान किया जाता है. दिनभर महिलाएं बिलास की बत्ती जलाती हैं और भजन-कीर्तन से बाबा की आराधना करती हैं.
रात में चौसर खेलने आते हैं भोलेनाथ!
मंदिर के पुजारी हरीश गोस्वामी बताते हैं कि रोज रात शयन आरती के बाद शिवलिंग के सामने चौसर बिछाई जाती है. सुबह जब मंदिर खुलता है तो चौसर बिखरी हुई मिलती है. मान्यता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ रात में चौसर खेलने आते हैं.
सांप की समाधि पर स्थापित है शिवलिंग
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग किसी मनुष्य की नहीं, बल्कि एक सांप की समाधि पर स्थापित है, जिसका नाम सिद्धू था. कहा जाता है कि सिद्धू का जन्म मल्लिवाल परिवार की एक महिला के गर्भ से हुआ था. आज भी महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के मुख्य शिखर पर ध्वजा मल्लिवाल परिवार द्वारा ही चढ़ाई जाती है.
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