Jamshedpur’s Pride Premlata Agrawal: प्रेमलता अग्रवाल ने 36 की उम्र में पर्वतारोहण शुरू किया और 20 मई 2011 को माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली भारत की सबसे उम्रदराज महिला बनीं. इसके बाद उन्होंने सेवेन समिट्स भी फतह की और पद्मश्री से नवाजी गईं.
जमशेदपुर सिर्फ उद्योगों के लिए ही नहीं, बल्कि बहादुरी और उपलब्धियों के लिए भी जाना जाता है. इसी शहर ने देश को एक ऐसी बेटी दी, जिसने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया. हम बात कर रहे हैं प्रेमलता अग्रवाल की, जिनका नाम आज हर जमशेदपुरवासी गर्व से लेता है.

प्रेमलता अग्रवाल का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती. गृहिणी के रूप में सामान्य जीवन जी रहीं प्रेमलता ने 36 वर्ष की उम्र के बाद पर्वतारोहण की शुरुआत की. जमशेदपुर में रहते हुए उन्होंने टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन से प्रशिक्षण लिया, जहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध पर्वतारोही Bachendri Pal से हुई. यही वह मोड़ था, जहां से उनके जीवन की दिशा बदल गई. कठिन अभ्यास, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति ने उन्हें एक नई पहचान दी.

20 मई 2011 को उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी Mount Everest को फतह कर इतिहास रच दिया. उस समय वह एवरेस्ट पर चढ़ने वाली भारत की सबसे उम्रदराज महिला बनीं लेकिन उनका सफर यहीं नहीं रुका. उन्होंने “सेवन समिट्स” यानी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को भी फतह किया और यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की पहली महिला बनीं. उनकी इस उपलब्धि के लिए भारत सरकार ने उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया.
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जमशेदपुर से उनका जुड़ाव बेहद गहरा है. शहर के लोग बताते हैं कि प्रेमलता अक्सर यहां के युवाओं से मिलती हैं और उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करती हैं. उनका पसंदीदा स्थान टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन का परिसर माना जाता है, जहां से उनके पर्वतारोहण की शुरुआत हुई थी. इसके अलावा, शहर के शांत और हरियाली भरे इलाकों में अभ्यास के दौरान बिताए गए पल उनकी यादों का अहम हिस्सा हैं.

प्रेमलता अग्रवाल सिर्फ एक पर्वतारोही नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं. उन्होंने यह साबित किया कि अगर इरादे मजबूत हों तो उम्र, जिम्मेदारियां और परिस्थितियां रास्ता नहीं रोक सकतीं. जमशेदपुर के लिए वह गर्व का प्रतीक हैं – एक ऐसी महिला, जिसने इस औद्योगिक नगरी का नाम विश्व मानचित्र पर रोशन किया.

आज भी जब शहर में उनका नाम लिया जाता है, तो लोगों की आंखों में सम्मान और गर्व साफ झलकता है. प्रेमलता अग्रवाल की कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि सपनों की उड़ान कभी भी भरी जा सकती है—बस हौसला होना चाहिए.
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