Jadugoda Jungle Palash Flowers: झारखंड के जादूगोड़ा में वसंत में पलाश के लाल-नारंगी, पीले और दुर्लभ सफेद रंग के फूल जंगल को चमकाते हैं. बता दें कि निताई मंडल इसके संरक्षण के प्रयास में हमेशा जुटे रहते हैं. बता दें कि पलाश जैव-विविधता का प्रतीक है.
वसंत ऋतु के आते ही झारखंड के जादूगोड़ा और आसपास के जंगल जैसे आग की लपटों से दहक उठते हैं. पेड़ों पर पत्तियां कम और फूल अधिक दिखाई देते हैं, और दूर से ही लाल-नारंगी रंग का समुद्र नजर आता है. यही है झारखंड का राजकीय फूल पलाश (Butea monosperma), जिसे ‘जंगल की ज्वाला’ कहा जाता है. इसके चमकीले फूल न केवल प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करते हैं. बल्कि स्थानीय संस्कृति, होली के प्राकृतिक रंग और आयुर्वेदिक औषधियों से भी जुड़े हैं. परंतु इस प्रसिद्ध लाल पलाश के अलावा इसके अन्य रंग भी मौजूद हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.

सबसे अधिक दिखाई देने वाला रंग लाल-नारंगी पलाश है. यही वह रूप है, जिसने पलाश को पहचान दिलाई है. वसंत में जब पेड़ की शाखाएं लगभग पत्तों से खाली हो जाती हैं. तब केवल फूलों की घनी परत दिखाई देती है और पूरा जंगल चमक उठता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसके फूलों से प्राकृतिक गुलाल बनाया जाता है, जो त्वचा के लिए सुरक्षित माना जाता है. पक्षियों, मधुमक्खियों और तितलियों के लिए भी यह अमृत का स्रोत है. इसलिए इसे जैव-विविधता का महत्वपूर्ण पौधा भी माना जाता है.

पलाश का दूसरा रूप पीले रंग का होता है, जिसे देख पाना आसान नहीं है. यह सामान्य जंगलों में बहुत कम दिखाई देता है और अक्सर शोधकर्ताओं या वनकर्मियों की नजर में ही आता है. पीला पलाश देखने में उतना ही आकर्षक है, किंतु इसकी पहचान कम होने के कारण यह लोगों की जानकारी से दूर है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह प्राकृतिक विविधता का उदाहरण है और यह दर्शाता है कि एक ही प्रजाति अलग-अलग रंगों में विकसित हो सकती है. दुर्भाग्य से जंगलों की कटाई और बदलते पर्यावरण के कारण इसकी संख्या लगातार घट रही है.
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सबसे दुर्लभ है सफेद पलाश. प्रकृति का यह अनोखा रूप अब शोध और संरक्षण का विषय बन चुका है. कई वर्षों से खोज के बावजूद जादूगोड़ा क्षेत्र में इसका पौधा मिलना कठिन हो गया है. कोलकाता के पौध शोधकर्ता निताई मंडल जैसे लोग इस प्रजाति को बचाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. उनका मानना है कि यदि समय रहते इन पौधों को सूचीबद्ध कर कृत्रिम प्रजनन के माध्यम से तैयार नहीं किया गया तो आने वाले समय में सफेद पलाश केवल किताबों तक सीमित रह जाएगा.

विशेषज्ञों का सुझाव है कि वन विभाग, स्थानीय लोग और संस्थाएं मिलकर इसके संरक्षण में भाग लें. सर्वेक्षण, पौधारोपण, नर्सरी विकास और जागरूकता अभियान इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं. यदि प्रयास सफल रहे तो जादूगोड़ा केवल लाल-नारंगी ही नहीं, बल्कि पीले और सफेद पलाश के लिए भी पहचान बना सकता है. पलाश के ये तीनों रंग हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति केवल सुंदरता नहीं, बल्कि हमारी विरासत है, जिसे बचाना आज हमारी जिम्मेदारी है. ताकि आने वाली पीढ़ियां भी वसंत में इन अद्भुत फूलों की छटा देख सकें.
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