हजारों साल प्राचीन मानव सभ्यता की साक्षी चिनाब नदी से डोडा जिले में एक ऐतिहासिक पुरातात्विक अवशेष मिला है। डोडा-किश्तवाड़ मार्ग पर नदी से निकली चट्टान पर नंदी और गजराज की उकेरी हुई कलाकृति मिली है। माना जा रहा है कि यह कलाकृति पांडव कालीन है। प्रदेश के अभिलेखागार, पुरातत्व और संग्रहालय विभाग इसे नौंवी सदी का मान रहा है। इसे संरक्षित करने की योजना पर काम शुरू हो गया है।
डोडा-किश्तवाड़ हाईवे पर महाला तहसील के अंतर्गत प्रेमनगर से गुजरने वाली चिनाब नदी में पड़े चट्टानों पर ये कलाकृतियां उकेरी हुई हैं। एक चट्टान पर आमने-सामने बैठे नंदी बैलों की एक जोड़ी को खूबसूरती से उकेरा गया है। उसके बगल में मौजूद दूसरे चट्टान पर गजराज (हाथी) की नक्काशी की गई है। दोनों कलाकृतियां इतनी स्पष्ट हैं कि नदी के किनारों पर खड़े होकर इसे आसानी से देखा जा सकता है।
अज्ञातवास के दौरान पांडवों द्वारा इसे बनाने की संभावना
स्थानीय लोग इसे पांडव कालीन मानते हुए पंच पांडव कहते हैं। कहते हैं कि संभवत: अज्ञातवास के दौरान पांडव इस रास्ते से गुजरे होंगे। प्रवास के दौरान ही उन्होंने यह कलाकृतियां बनाई होंगी। पांचोंं भाइयों में नकुल शिल्पकार भी थे। लिहाजा संभव है कि उन्होंने ही यह नक्काशी की होगी। हजारों साल गुजरने के बाद भी यह सुरक्षित है और सुनहरे अतीत के विरासत की कहानी बयां कर रही है।
गर्मियों में पानी में डूब जाती है चट्टान
गर्मियों में बर्फ पिघलने से चिनाब नदी का जलस्तर बढ़ने से कलाकृति को समेटे चट्टानें पानी में डूब जाती हैं। बाहर से दिखती नहीं हैं लेकिन ठंड में जलस्तर कम होते ही चट्टानें बाहर आ जाती हैं। उन पर उकेरी नंदी और गजराज की कलाकृतियां स्पष्ट रूप से दिखने लगती हैं।
प्रथम दृष्टया यह शिलाकला नौंवी सदी की प्रतीत हो रही है लेकिन स्पष्ट रूप से पुरातात्विक जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। फिलहाल इस स्थान को संरक्षित करने की योजना पर काम शुरू हो गया है। उम्मीद है परिणाम काफी सुखद होगा।
-मुकुल मगोत्रा, प्रभारी डोगरा आर्ट म्यूजियम जम्मू
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