वरिष्ठ नागरिक द्वारा अपने बेटे के पक्ष में की गई संपत्ति ट्रांसफर को निरस्त करने की मांग को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक यह सिद्ध न हो कि संपत्ति हस्तांतरण गुजारा भत्ता की शर्त पर किया गया था, तब तक माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 के तहत ट्रांसफर रद्द नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने बेटे को पूर्व में तय गुजारा भत्ता की पूरी बकाया राशि आठ समान मासिक किस्तों में अदा करने का निर्देश दिया
जींद निवासी वरिष्ठ नागरिक शिव कुमार ने याचिका में आरोप लगाया गया था कि बेटे ने छल और प्रलोभन देकर वर्ष 2018 में मकान और दुकान अपने नाम ट्रांसफर करवा लिए और बाद में उनका व्यवहार बदल गया तथा उचित देखभाल भी नहीं की गई। अदालत के समक्ष राज्य सरकार और अन्य पक्षों ने दलील दी कि संबंधित रिलीज डीड में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि संपत्ति का हस्तांतरण गुजारा भत्ता की शर्त पर किया गया था।
साथ ही यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता ने ट्रांसफर को धोखाधड़ी बताकर पहले ही सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर रखा है, जो अभी विचाराधीन है। ऐसे में संपत्ति हस्तांतरण को निरस्त करने का प्रश्न सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अदालत ने कहा कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल द्वारा वर्ष 2021 में दिया गया 10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण का आदेश यथावत प्रभावी है और उसे चुनौती नहीं दी गई है। अदालत के समक्ष बेटे की ओर से बकाया राशि किस्तों में जमा कराने की इच्छा जताई गई, जिसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने उसे आठ माह के भीतर आठ समान किस्तों में पूरी बकाया राशि जमा कराने का निर्देश दिया। साथ ही वरिष्ठ नागरिक की याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि निर्धारित अवधि में गुजारा भत्ता की राशि का भुगतान नहीं किया गया तो वरिष्ठ नागरिक को कानून के तहत आगे की कार्रवाई करने का अधिकार रहेगा। इस प्रकार कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए मेंटेनेंस भुगतान सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
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