इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 43 साल पहले हुई हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे तीन कैदियों को बेगुनाह करार दिया। उन्हें बरी करने का फैसला सुनाते हुए अभियोजन की कहानी पर हैरानी जताई। कहा कि अगर किसी को बताया जाए कि उसके भाई की बेरहमी से पिटाई हो रही है तो क्या वह लंबा रास्ता चुनकर निहत्था तमाशबीन बनने के लिए मौके पर पहुंचेगा।
अगर 11 लोग मिलकर हत्या करने पर आमादा हों तो क्या वे एक घंटे तक मारते रहेंगे, ताकि लोग उन्हें देख लें और उनकी पिटाई से सिर्फ 10 चोटें ही आएंगी। इन तल्ख सवालों संग न्यायमूर्ति जेजे मुनीर व न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने प्रयागराज की सत्र अदालत की ओर से सुनाई गई सजा रद्द कर दी। कहा कि अभियोजन की कहानी न केवल अविश्वसनीय है, बल्कि सामान्य मानवीय व्यवहार के भी विपरीत है। यह एक ब्लाइंड मर्डर है। पुलिस ने वास्तविक हत्यारे की तलाश के बजाय संदेह और अनुमान के आधार पर आरोप पत्र दाखिल किया। ट्रायल कोर्ट गवाहों व साक्ष्यों के तार्किक परीक्षण में विफल रहा।