गोड्डा कॉलेज की बी.एड सेमेस्टर-1 की छात्रा मोना भारती ने कॉलेज के एक प्रोफेसर और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं. मोना का कहना है कि पिछले कई दिनों से उन्हें कॉलेज परिसर में प्रवेश करने से रोका जा रहा है. आरोप है कि उन्हें यह कहकर बाहर कर दिया जाता है कि वे ‘लड़कों जैसे कपड़े’ पहनकर कॉलेज क्यों आ रही हैं. मोना के अनुसार, इस वजह से उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है और उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है.
मोना भारती का कहना है कि कॉलेज प्रशासन द्वारा जारी ड्रेस कोड में कहीं भी लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग पहनावे का उल्लेख नहीं है. कॉलेज की ओर से केवल ड्रेस का रंग निर्धारित किया गया है, जिसे वह पूरी तरह से फॉलो कर रही हैं. मोना बताती हैं कि वह फॉर्मल शर्ट और पैंट पहनकर कॉलेज आती हैं, क्योंकि उसी पहनावे में वह खुद को सहज और आत्मविश्वास से भरा महसूस करती हैं.
छात्रा ने यह भी आरोप लगाया कि कॉलेज के कुछ प्रोफेसर उन्हें अपमानजनक टिप्पणियां करते हैं, जैसे ‘तुम लड़की हो, लड़की बनकर रहो’ और ‘लड़कियों वाले सूट में ही कॉलेज आओ.’ मोना का सवाल है कि जब कॉलेज के लिखित नियमों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो फिर उन्हें जबरन एक खास तरह का पहनावा अपनाने के लिए मजबूर क्यों किया जा रहा है.
इस पूरे मामले पर लोकल 18 की टीम ने गोड्डा कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विवेकानंद सिंह से बातचीत की. प्राचार्य ने कहा कि कॉलेज में सभी छात्र-छात्राओं के लिए ड्रेस कोड का पालन करना अनिवार्य है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि मोना को ‘लड़कियों की तरह सूट पहनकर’ ही कॉलेज आना होगा. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यदि मोना के पास सूट खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, तो वह खुद इसका खर्च उठाने को तैयार हैं.
हालांकि, प्राचार्य के इस बयान के बाद विवाद और गहरा गया है, क्योंकि कॉलेज की ओर से जारी आधिकारिक सूचना में कहीं भी लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग ड्रेस कोड का उल्लेख नहीं है. सिर्फ रंग का जिक्र किया गया है, जिसे मोना पहले से ही फॉलो कर रही हैं. मोना भारती का कहना है कि कॉलेज की कक्षाओं में उन्हें जेंडर इक्वलिटी, महिला सशक्तिकरण और समान अधिकारों के बारे में पढ़ाया जाता है, लेकिन व्यवहार में उन्हें बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि वह एक लड़की हैं और उन्हें ‘लड़की की सीमा’ में ही रहना चाहिए.
अब यह मामला केवल ड्रेस कोड तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है क्या आज भी शिक्षा के मंदिरों में जेंडर इक्वलिटी सिर्फ किताबों तक ही सीमित है? और क्या किसी छात्रा की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मसम्मान से समझौता किया जा सकता है? फिलहाल यह मामला जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि कॉलेज प्रशासन आगे क्या रुख अपनाता है.
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