Genda Phool Farming Disease Prevention: इस मौसम में गेंदा में बहुत से रोग और कीट लगते हैं जो फसल को बेहद नुकसान पहुंचा सकते हैं. जैसे मुरझा रोग, भभूतिया, गलना, लाल मकड़ी, झिल्लियां और थ्रिप्स. डॉ. रूपा से जानें इनसे बचाव के उपाय, रोकथाम और इलाज.
बागवानी के शौकीनों से लेकर पेशेवर किसानों तक, झारखंड में गेंदा फूल की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. लेकिन समय पर देखभाल और सही जानकारी के अभाव में कीट और रोग गेंदा की फसल को बुरी तरह प्रभावित कर देते हैं. इसका सीधा असर उत्पादन दर पर पड़ता है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. इसी कड़ी में बोकारो कृषि विज्ञान केंद्र, पेटरवार की वैज्ञानिक डॉ. रूपा ने गेंदा फूल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों के नियंत्रण को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है.

डॉ. रूपा ने बताया कि गेंदा में मुरझा रोग एक गंभीर फफूंद जनित बीमारी है, जो पूरे पौधे को प्रभावित करती है. इस रोग में पौधे अचानक मुरझाने लगते हैं, पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं और पौधे की बढ़वार पूरी तरह रुक जाती है. ऐसे में इसके<br />नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम और मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना प्रभावी रहता है.

भभूतिया रोग, जिसे पाउडरी मिल्ड्यू भी कहा जाता है, इस रोग में पौधों पर सफेद रंग की परत जम जाती है, जो फूलों के विकास को रोक देती है और छूने पर हाथों में चिपकती है. ऐसे में सॉल्युबल सल्फर या सल्फर पाउडर 2.5 ग्राम को 1 से 1.5 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इस रोग से राहत मिलती है.
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पौधे का गलना रोग भी गेंदा की खेती में एक गंभीर समस्या है, जिसमें सबसे पहले जड़ और तना प्रभावित होते हैं और पौधा झुककर टूट जाता है. इससे बचाव के लिए बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या क्लोरोथेलोनिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर मिट्टी को भिगोना या जड़ों के पास छिड़काव करना चाहिए जिससे पौधे और फूल सुरक्षित रहते हैं.

गेंदा की फसल में लाल मकड़ी भी प्रमुख कीट है, जो पत्तियों के निचले हिस्से में रहकर रस चूसती है, जाल बिछाती है और पौधे की बढ़वार को प्रभावित करती है. इसके नियंत्रण के लिए रोगर 35 ई.सी या नुवाक्रॉन 40 ई.सी की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से लाभकारी होता है.

वहीं झिल्लियों का प्रकोप गेंदा के फूल पर काफी अधिक देखने को मिलता है जो पत्तियों और कलियों को खाकर भारी नुकसान पहुंचाते हैं. जिससे किसानों को भारी नुकसान होता है. ऐसे में इससे बचाव के लिए नुवान 50 ई.सी या थायोडान 35 ई.सी की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से गेंदा को बचाया जा सकता है.

गेंदा की खेती में थ्रिप्स का प्रकोप भी काफी अधिक देखने को मिलता है जो तेजी से फैलते हैं और पत्तियों, कोमल टहनियों और फूलों की कलियों में छिपकर उनका रस चूसते हैं जिस कारण गेंदे का फूल छोटा हो जाता है और पत्तियां मुड़ने लगती हैं. कलियां समय से पहले सूख जाती हैं और फूल बदरंग हो जाते हैं. ऐसे में इसे नियंत्रित करने के लिए हफ्ते में एक बार नीम तेल का छिड़काव पौधे पर जरूर करें.

इसके अलावा गेंदे के फूल में कलियों का सड़ना जैसी समस्याएं भी फंगल संक्रमण के कारण होती हैं, जिससे पौधे की शोभा बिल्कुल खराब हो जाती है. ऐसे में इसके नियंत्रण के लिए डाइथेन एम-45 फफूंदीनाशक दवा 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने पर पौधे और फूल सुरक्षित रहते हैं.
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