कटरा। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शनिवार को थाईलैंड से आए अनुयायियों के 35 सदस्यीय दल से गुलजार रही। सभी अनुयायियों ने बौद्ध भिक्षु देवानंद के नेतृत्व में जेतवन परिसर में पारंपरिक तरीके से दर्शन-पूजन किया। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु देवानंद ने कहा कि श्रावस्ती 2,500 वर्ष पूर्व भारत के छह प्रमुख नगरों में से एक था और कोशल राज्य की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित था। भगवान बुद्ध के समय में धार्मिक गतिविधियों का भी एक महत्वपूर्ण स्थल था। बौद्ध इतिहास के अनुसार भगवान बुद्ध पहली बार श्रावस्ती व्यापारी सुदत्ता (अनाथपिंडिक) के आग्रह पर आए थे। सुदत्ता भगवान बुद्ध के ठहरने के लिए एक उपयुक्त स्थान खोज रहे थे, इस दौरान उन्हें श्रावस्ती के दक्षिणी छोर पर स्थित एक सुंदर उपवन दिया।
उपवन श्रावस्ती के राजा प्रसेनजित के बेटे जेत की संपत्ति थी। सुदत्ता के आग्रह पर राजकुमार जेत ने शर्त रखी कि जितनी भूमि को वह सोने के सिक्कों से ढकेंगे, उनकी भी भूमि उन्हें मिलेगी। शर्त के मुताबिक सुदत्ता ने भूमि पर सोने के सिक्के बिछा दिए लेकिन उपवन का एक छोटा हिस्सा बिना ढके रह गया। सुदत्ता की भक्ति और निष्ठा से प्रभावित होकर राजकुमार जेत ने अपने बहुमूल्य वन का दान कर जेतवन विहार के निर्माण में सहायता की।
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